किसी प्रधानमंत्री की असली ताक़त न तो उसके भाषणों में छिपी होती है, न ही प्रचार की बनाई गई छवि में, बल्कि उस क्षण सामने आती है जब वैश्विक शक्तियाँ दबाव बनाती हैं और देश का नेतृत्व या तो खड़ा होता है—या झुकता है। भारत में पिछले दस वर्षों से “मजबूत प्रधानमंत्री” की जिस छवि को आक्रामक राष्ट्रवाद, सैन्य शब्दावली और भावनात्मक नारों के सहारे गढ़ा गया, उसने एक बुनियादी सवाल को ढक दिया—क्या यह मजबूती वास्तविक है या केवल प्रदर्शन? जैसे-जैसे चीन आक्रामक हुआ, पड़ोसी देशों ने कड़े रुख अपनाए, और अमेरिका सहित बड़ी शक्तियों ने अपने हितों को प्राथमिकता दी, वैसे-वैसे यह स्पष्ट होता गया कि भारत की प्रतिक्रिया उतनी सीधी और टकरावपूर्ण नहीं रही जितनी उसकी राजनीतिक छवि थी। यहीं से “Compromised Prime Minister” की अवधारणा उभरती है—एक ऐसा नेतृत्व जो केवल वैश्विक स्तर पर ही नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति में भी अडिगता का दावा करता रहा, लेकिन बड़े निर्णयों पर बार-बार रुख बदलने, नीतियों को वापस लेने और विरोध के दबाव में कदम पीछे खींचने को मजबूर दिखाई दिया; जिससे यह प्रश्न और गहरा होता है कि क्या वास्तविक शक्ति स्थिरता में थी या केवल प्रस्तुति में।
2014 से पहले देश को यह विश्वास दिलाया गया कि डॉ. मनमोहन सिंह भारत के सबसे “कमज़ोर” प्रधानमंत्री थे—क्योंकि वे उत्तेजक भाषा का प्रयोग नहीं करते थे, क्योंकि वे संयमित कूटनीति में विश्वास रखते थे और क्योंकि उन्होंने राष्ट्रवाद को मंचीय नारे में परिवर्तित नहीं किया। उन्हें “मौन”, “रिमोट कंट्रोल” और “निर्णयहीन” कहकर खारिज किया गया, जबकि इसके उलट एक ऐसे नेता को विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया जिसने 56 इंच के सीने, लाल आँख और आक्रामक प्रतिशोध की भाषा के साथ स्वयं को निर्णायक चेहरा बताया। इस छवि को स्थापित करने के लिए व्यापक प्रचार, संसाधन और रणनीतिक संचार तंत्र का उपयोग हुआ। PS-PAC Analysis इसी बिंदु से आगे बढ़ता है—जहाँ हम भावनात्मक दावों से परे जाकर घटनाओं, नीतिगत यू-टर्न, कूटनीतिक परिणामों और वैश्विक समीकरणों के आधार पर यह परखेंगे कि क्या घोषित आक्रामकता वास्तविक रणनीतिक बढ़त में बदली, या नेतृत्व को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच अपेक्षा से अधिक संतुलन और समझौते करने पड़े।
चीन के सामने झुकी रणनीति? कैलाश रेंज से LAC तक—निर्णयहीन नेतृत्व की भारी कीमत
2020 का लद्दाख संकट केवल सीमा पर सैन्य गतिरोध नहीं था, बल्कि यह उस नेतृत्व की विश्वसनीयता की परीक्षा थी जिसने स्वयं को “निर्णायक” बताया था। जब पूर्वी लद्दाख में चीन की गतिविधियाँ बढ़ीं, गलवान में 20 सैनिक शहीद हुए और कैलाश रेंज के आसपास हालात अत्यंत संवेदनशील बने, तब देश को स्पष्ट, ठोस और सार्वजनिक राजनीतिक दिशा की अपेक्षा थी। जनरल मनोज मुकुंद नरवाने ने अपनी आत्मकथा “Four Stars of Destiny” में उल्लेख किया है कि शीर्ष स्तर से संपर्क और विचार-विमर्श के बाद देर रात संदेश मिला—“जो उचित लगे वह करो।” दो परमाणु शक्तियों के बीच टकराव की आशंका वाले क्षण में क्या यही अंतिम और स्पष्ट राजनीतिक आदेश था? इसके साथ ही, 19 जून 2020 का प्रधानमंत्री का सार्वजनिक बयान—“न तो कोई हमारी सीमा में घुसा है…”—ने स्थिति को और उलझाया, क्योंकि उसी समय जमीनी स्तर पर व्यापक सैन्य तैनाती और वार्ताएँ जारी थीं। जब नेतृत्व सार्वजनिक रूप से स्पष्ट रेखा खींचने से बचता है, तो उसका असर केवल घरेलू विमर्श पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय धारणा पर भी पड़ता है।
प्रधानमंत्री की चुप्पी और 19 जून 2020 के बयान का स्पष्ट रणनीतिक प्रभाव पड़ा। जमीनी स्तर पर भारी सैन्य तैनाती और लगातार वार्ताएँ चल रही थीं, फिर भी घुसपैठ से इनकार किया गया—जिससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर औपचारिक कूटनीतिक दबाव सीमित हो गया।
इसके परिणाम कई स्तरों पर दिखे:
कूटनीतिक दबाव कमजोर पड़ा: जब स्थिति को सार्वजनिक रूप से सामान्य बताया गया, तो चीन के खिलाफ व्यापक वैश्विक समर्थन और औपचारिक आपत्ति दर्ज कराने की गुंजाइश कम हो गई।
जमीनी वास्तविकता बनाम आधिकारिक बयान का अंतर: भारी सैन्य जमावड़ा, कोर कमांडर वार्ताएँ और उपग्रह संकेतों ने गंभीरता दर्शाई, जिससे सरकारी बयान की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठे।
वार्ता का फ्रेम सीमित हुआ: स्पष्ट राजनीतिक “रेड लाइन” तय न होने से बातचीत पूर्व-स्थिति बहाली के बजाय केवल तनाव-प्रबंधन तक सिमटती दिखी।
आर्थिक विरोधाभास उजागर हुआ: 2022-23 में चीन के साथ व्यापार घाटा लगभग 100 अरब डॉलर के आसपास दर्ज हुआ, जबकि निर्भरता कम करने की नीति की घोषणा की गई थी।
दीर्घकालिक सैन्य और वित्तीय दबाव: ऊँचाई वाले क्षेत्रों में स्थायी तैनाती ने लॉजिस्टिक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और रक्षा बजट पर लगातार बोझ डाला।
निर्णायक क्षणों का मौन केवल राजनीतिक शैली नहीं होता—वह प्रतिद्वंद्वी और दुनिया दोनों को एक संकेत देता है। चीन प्रकरण में यही संकेत सबसे अधिक बहस का विषय बना।
पाकिस्तान मोर्चे पर कूटनीतिक फिसलन: ऑपरेशन सिंदूर, ट्रंप का ऐलान और नियंत्रण खोता नैरेटिव
भारत–पाकिस्तान संबंध हमेशा जटिल रहे हैं, लेकिन पहले के दौर में—चाहे कारगिल हो या संसद हमले के बाद का सैन्य तनाव—भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्थिति स्पष्ट, आक्रामक और स्वयं नियंत्रित रखी। संकट का संदेश दिल्ली से जाता था, वॉशिंगटन या किसी और राजधानी से नहीं।
Operation Sindoor के दौरान घटनाक्रम ने अलग तस्वीर पेश की। सीमा पर तनाव और सैन्य गतिविधियों के बीच अचानक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सार्वजनिक टिप्पणी ने युद्धविराम/तनाव-नियंत्रण की दिशा का संकेत दिया। सवाल यहीं खड़ा होता है—जब दो परमाणु शक्तियों के बीच तनाव चरम पर हो, तो निर्णायक घोषणा का केंद्र नई दिल्ली क्यों नहीं रहा? यदि रणनीति पूरी तरह नियंत्रण में थी, तो अंतरराष्ट्रीय सुर्खियाँ किसी तीसरे देश के बयान से क्यों बनीं?
यह केवल बयान की टाइमिंग का मामला नहीं था, बल्कि नैरेटिव की कमान का था। एक ओर घरेलू स्तर पर कठोर रुख और निर्णायक कार्रवाई की छवि बनाई गई, दूसरी ओर समापन चरण में वैश्विक धारणा यह बनी कि संकट-प्रबंधन में बाहरी प्रभाव सक्रिय था। इससे तीन स्तरों पर नुकसान दिखा—
- पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर “संयमित पक्ष” की भाषा अपनाने का अवसर मिला।
- भारत की स्वायत्त कूटनीतिक छवि पर प्रश्न उठा।
- घोषित आक्रामक रणनीति और अंतिम परिणाम के बीच अंतर ने विश्वसनीयता पर असर डाला।
रणनीतिक हार हमेशा क्षेत्र खोने से नहीं मापी जाती—कभी-कभी वह उस क्षण में दिखती है जब कथा पर नियंत्रण हाथ से फिसल जाता है। प्रश्न सीधा है: क्या वर्तमान विदेश नीति पाकिस्तान के साथ टकराव को भारत-नियंत्रित ढांचे में रख पा रही है, या हर बड़े तनाव के बाद अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की छाया में कहानी खत्म हो रही है?
पड़ोस में बिखरता प्रभाव: कमजोर विदेश नीति ने दक्षिण एशिया में भारत की पकड़ ढीली की
दक्षिण एशिया लंबे समय तक भारत की प्राकृतिक रणनीतिक परिधि माना जाता रहा, जहाँ सुरक्षा, व्यापार और राजनीतिक समन्वय में भारत की निर्णायक भूमिका थी। लेकिन हाल के वर्षों में असंगत संदेशों, देरी से प्रतिक्रिया और स्पष्ट दीर्घकालिक रणनीति के अभाव ने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को तनावपूर्ण बना दिया। परिणाम यह हुआ कि जहाँ भारत को स्थिरता और विश्वास का केंद्र होना चाहिए था, वहीं कई मोर्चों पर उसे रक्षात्मक स्थिति में खड़ा होना पड़ा—और इसका सीधा असर राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमाई संतुलन और समुद्री हितों पर दिखाई देने लगा।
- नेपाल ने लिपुलेख–कालापानी–लिम्पियाधुरा को अपने आधिकारिक नक्शे में शामिल कर संविधान संशोधन किया, जिससे सीमा विवाद औपचारिक टकराव में बदल गया और चीन को काठमांडू में अधिक रणनीतिक अवसर मिले।
- मालदीव में “India Out” अभियान ने भारतीय उपस्थिति को राजनीतिक मुद्दा बना दिया, जबकि समानांतर रूप से चीन की परियोजनाओं ने हिंद महासागर में भारत की स्थिति को चुनौती दी।
- बांग्लादेश के साथ सीमावर्ती सुरक्षा और अवैध घुसपैठ के मुद्दे समय-समय पर तनाव का कारण बने, जिससे आंतरिक सुरक्षा और सीमा प्रबंधन पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।
- श्रीलंका के आर्थिक संकट के दौरान भारत की सहायता के बावजूद चीन की कर्ज-आधारित रणनीति और हंबनटोटा जैसे उदाहरणों ने समुद्री शक्ति-संतुलन को भारत के लिए जटिल बनाया।
जब पड़ोसी देश एक-एक कर वैकल्पिक शक्तियों की ओर झुकने लगें या द्विपक्षीय विश्वास कमजोर होने लगे, तो यह केवल संबंधों की ठंडक नहीं होती—यह उस रणनीतिक शून्य का संकेत होता है जिसकी कीमत देश को दीर्घकाल में सुरक्षा और प्रभाव, दोनों स्तरों पर चुकानी पड़ती है।
क्या प्रधानमंत्री हर मोड़ पर Compromised हैं?
भारत-अमेरिका संबंध अब केवल साझेदारी नहीं रहे; यह दबाव, मजबूरी और वैश्विक हस्तक्षेप का खेल बन गए हैं। आलोचक लगातार यह सवाल उठाते हैं कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर क्षेत्र में अमेरिकी दबाव के आगे राष्ट्रीय हित की बजाय मजबूरी में झुकना चुना। शुरुआत में मोदी को अमेरिका आने तक की अनुमति नहीं मिली, फिर ट्रंप की जीत के लिए भारत का प्रचार मंच पर इस्तेमाल हुआ। सैन्य, व्यापार, ऊर्जा और कूटनीति—हर मोर्चे पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में अमेरिका की प्राथमिकताओं को लगातार प्राथमिकता मिलती रही।
यहाँ कुछ निर्णायक उदाहरण हैं, जो “Compromised Prime Minister” की अवधारणा को प्रमाणित करते हैं:
ऑपरेशन सिंदूर: जब भारत-पाक सीमा पर संवेदनशील सैन्य स्थिति पैदा हुई, युद्धविराम का पहला सार्वजनिक संकेत अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के ट्वीट से आया, जबकि दिल्ली की प्रतिक्रिया केवल चुप्पी और अस्पष्ट बयान तक सीमित रही। यह दिखाता है कि निर्णायक क्षणों में भारत की राजनीतिक नेतृत्व क्षमता दबाव के सामने अस्थिर रही।
भारतीय नागरिकों का प्रत्यर्पण: अमेरिका में कुछ भारतीय नागरिकों को बेड़ियों में बांधकर लौटाया गया, और सरकार की चुप्पी ने राष्ट्रीय स्तर पर सवाल खड़े कर दिए कि क्या नागरिक सुरक्षा अमेरिकी दबाव के आगे पूरी तरह नजरअंदाज की गई।
व्यापार और ऊर्जा दबाव: टैरिफ विवाद और GSP से बाहर किया जाना, वेनेजुएला से तेल खरीदने का दबाव, रूस से तेल खरीदने को रोकने की अमेरिकी मांग—इन सभी मामलों में भारत ने मजबूरी में नीति में समायोजन किया, जिससे आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा की स्वतंत्रता प्रभावित हुई।
ट्रेड डील: हाल ही में हुए व्यापार समझौतों में अमेरिकी शर्तों को प्राथमिकता देना, जिसमें घरेलू उद्योगों और आर्थिक स्वायत्तता पर प्रभाव पड़ा।
Epstein फाइल का विवाद: विपक्ष और वैश्विक मंचों में यह बहस तेज़ हुई कि मोदी व्यक्तिगत और अंतरराष्ट्रीय दबाव के अधीन नीति निर्माण कर रहे हैं, जिससे भारत की वैश्विक छवि कमजोर हुई।
सैन्य, व्यापार, ऊर्जा और कूटनीति—हर क्षेत्र में भारत ने बार-बार मजबूरी में समझौता किया। निर्णायक क्षणों में सार्वजनिक चुप्पी, बाध्य प्रतिक्रिया और दबाव स्वीकार करना केवल शब्दों की कमी नहीं; यह वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति कमजोर दिखाने वाला स्पष्ट संकेत बन गया। हर कदम पर यह सवाल उठता है: क्या यह संयम है या वह झुकाव जिसने देश को दीर्घकालिक रणनीतिक कीमत चुकाने पर मजबूर किया? यही कारण है कि आलोचक नरेंद्र मोदी को “Compromised Prime Minister” कहते हैं—एक ऐसा नेता जिसकी राजनीतिक छवि और अंतरराष्ट्रीय निर्णयों के बीच खाई लगातार बढ़ती जा रही है।
भारत का नेतृत्व दबाव में: Compromised Prime Minister की हकीकत | PS-PAC Analysis
मोदी सरकार की विदेश नीति और वैश्विक रणनीति की वजह से पिछले वर्षों में देश ने राष्ट्रीय हित पर भारी कीमत चुकाई है। चीन के साथ कैलाश रेंज और गलवान में निर्णायक क्षणों में अस्पष्ट संदेश, पाकिस्तान के मोर्चे पर Operation Sindoor और अमेरिकी हस्तक्षेप, दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के साथ संतुलन खोना, व्यापार और ऊर्जा मामलों में मजबूरी—हर मोर्चे पर संकेत देते हैं कि भारत ने दबाव के आगे लगातार समझौते किए। अमेरिकी टैरिफ, वेनेजुएला और रूस से तेल की नीति में मजबूरी, हाल ही हुए ट्रेड डील में हर अमेरिकी शर्त मानना, भारतीय नागरिकों का प्रत्यर्पण और Operation Sindoor में युद्धविराम का संकेत अमेरिकी ट्वीट से मिलना—ये सभी स्पष्ट उदाहरण हैं कि निर्णायक क्षणों में राजनीतिक नेतृत्व स्थिर नहीं रहा।
देश की विदेश नीति की कमजोर नींव ने न केवल अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता को डगमगाया, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता को भी समझौतों और दबाव के अधीन बना दिया। ऑपरेशन सिंदूर से लेकर व्यापार, ऊर्जा और वैश्विक दबाव तक—हर मोर्चे पर भारत को पीछे हटते हुए देखा गया। यह स्पष्ट संकेत है कि नरेंद्र मोदी “Compromised Prime Minister” बन चुके हैं: राजनीतिक छवि और वास्तविक कूटनीति के बीच खाई इतनी गहरी हो गई है कि भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा, आर्थिक हित और वैश्विक ताक़त अब केवल प्रदर्शन और समझौते से नापी जाती हैं। PS-PAC Analysis यह दिखाता है कि भारत की वर्तमान नेतृत्व शैली ने देश को वास्तविक वैश्विक निर्णय क्षमता और रणनीतिक दबाव दोनों में कमजोर बना दिया है।

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