2014 में बड़े-बड़े वादों, “अच्छे दिन”, निर्णायक नेतृत्व और विकास के आक्रामक नैरेटिव के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार के इस वर्ष मई में 12 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इन 12 वर्षों में सरकार ने अपनी उपलब्धियों का एक चमकदार प्रचार तंत्र खड़ा किया, जिस पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए। लेकिन ज़मीनी हकीकत बार-बार उस प्रचार से टकराती हुई दिखाई देती है।
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| Modi Government 12 years failures analysis by PS-PAC |
इस लेख में PS-PAC मोदी सरकार के इन 12 वर्षों का एक तथ्यात्मक और आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा है। सवाल सीधा है—क्या इन 12 वर्षों में देश को वही मिला, जिसका वादा जनता से किया गया था? बढ़ती बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों का संकट, कमजोर होती अर्थव्यवस्था, सामाजिक ध्रुवीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उठते सवाल किसी एक घटना का नहीं, बल्कि नीतिगत विफलताओं की एक लंबी श्रृंखला की ओर इशारा करते हैं। यह लेख मोदी सरकार के 12 साल के शासनकाल की 12 सबसे बड़ी असफलताओं का विश्लेषण करता है, जिनका सीधा असर देश, लोकतंत्र और आम नागरिक के भविष्य पर पड़ा है।
12 साल 12 असफलताएं
1. पिछले 45 वर्षों में बेरोज़गारी अपने सबसे उच्चतम स्तर पर
मोदी सरकार के शासनकाल की सबसे गंभीर और व्यापक असफलताओं में बेरोज़गारी संकट सबसे ऊपर खड़ा दिखाई देता है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की ही रिपोर्ट के अनुसार, 2017–18 की पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) में भारत की बेरोज़गारी दर 6.1% दर्ज की गई, जिसे आधिकारिक रूप से पिछले 45 वर्षों में सबसे अधिक माना गया। यह वही दौर था जब सरकार “हर साल 2 करोड़ नौकरियों” का वादा कर रही थी। स्थिति और चिंताजनक तब हो जाती है जब युवा बेरोज़गारी पर नज़र डालें—PLFS के अनुसार 15–29 वर्ष आयु वर्ग में बेरोज़गारी दर कई राज्यों में 20% से अधिक तक पहुंच गई। संगठित क्षेत्र में नई नौकरियों का सृजन ठप पड़ा, जबकि असंगठित क्षेत्र नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों से गहरे संकट में चला गया। सरकारी भर्तियों में देरी, परीक्षाओं का रद्द होना, पेपर लीक और निजी क्षेत्र में ठोस रोजगार अवसरों की कमी ने करोड़ों युवाओं को हताशा और अनिश्चित भविष्य की ओर धकेल दिया।
2. नोटबंदी: देश के व्यापार और अर्थव्यवस्था के लिए अभिशाप
8 नवंबर 2016 को घोषित नोटबंदी को मोदी सरकार ने काले धन, नकली नोट और आतंकवाद की फंडिंग पर निर्णायक प्रहार बताया था। लेकिन भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की 2018 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, नोटबंदी के तहत चलन से बाहर किए गए ₹15.41 लाख करोड़ में से ₹15.31 लाख करोड़ (लगभग 99.3%) नोट वापस बैंकिंग प्रणाली में लौट आए। यह आंकड़ा अपने आप में सरकार के दावों की सच्चाई उजागर करता है।
नोटबंदी के सबसे गंभीर दुष्परिणाम रोज़गार और असंगठित क्षेत्र में देखने को मिले। CMIE के अनुसार, नोटबंदी के बाद के महीनों में करीब 15 लाख से अधिक नौकरियां समाप्त हो गईं। नकदी पर निर्भर छोटे व्यापारी, कारीगर, किसान और दैनिक मज़दूर सबसे अधिक प्रभावित हुए, जबकि देश की GDP वृद्धि दर भी नोटबंदी के बाद लगातार दबाव में आती चली गई। बिना पर्याप्त तैयारी और वैकल्पिक व्यवस्था के लागू की गई नोटबंदी एक ऐसी नीतिगत विफलता साबित हुई, जिसने काले धन को पकड़ने में असफल रहते हुए अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों की आजीविका को गहरा नुकसान पहुँचाया।
3. GST: एक अनियंत्रित, अव्यवस्थित और उलझी हुई कर व्यवस्था
“वन नेशन, वन टैक्स” के नारे के साथ लागू किया गया वस्तु एवं सेवा कर (GST) सिद्धांत रूप से एक बड़ा सुधार था, लेकिन इसका क्रियान्वयन मोदी सरकार की एक गंभीर नीतिगत विफलता साबित हुआ। GST काउंसिल की बैठकों में बार-बार दरों में बदलाव, स्लैब की जटिल संरचना और तकनीकी खामियों ने इस कर व्यवस्था को आम व्यापारियों के लिए एक बोझ बना दिया। सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार, GST लागू होने के बाद पहले ही वर्ष में लाखों छोटे और मध्यम व्यापार (MSME) या तो बंद हो गए या अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में वापस लौट गए। नेशनल सैंपल सर्वे (NSSO) और विभिन्न उद्योग संगठनों की रिपोर्टों में यह बात सामने आई कि अनुपालन (compliance) की जटिल प्रक्रिया, बार-बार रिटर्न फाइलिंग और पोर्टल की तकनीकी समस्याओं ने छोटे व्यापारियों की लागत और अनिश्चितता दोनों बढ़ा दी।
इसके अलावा, GST संग्रह में अस्थिरता, राज्यों को मुआवज़े के भुगतान में देरी और केंद्र-राज्य विवादों ने सहकारी संघवाद की भावना को भी कमजोर किया। जिस कर सुधार को अर्थव्यवस्था को सरल और पारदर्शी बनाना था, वही GST मोदी सरकार के कार्यकाल में छोटे व्यापारियों, राज्यों और रोजगार—तीनों के लिए अस्थिरता और दबाव का कारण बन गया।
4. महंगाई: गरीब को और गरीब बनाने की सरकारी नीति
मोदी सरकार के 12 वर्षों में महंगाई आम नागरिक के लिए सबसे स्थायी और घातक संकट बन चुकी है। NSO और RBI के आँकड़ों के अनुसार, खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) कई वर्षों तक 8–10% के स्तर पर बनी रही, जबकि दालों, खाद्य तेल और सब्ज़ियों की कीमतों में कुछ वर्षों में 20–30% तक की वार्षिक बढ़ोतरी दर्ज की गई। घरेलू रसोई का बजट इस कदर बिगड़ा कि 2014 में ₹400 वाला LPG सिलेंडर 2023–24 में ₹1,100 के आसपास पहुँच गया, वहीं पेट्रोल ₹70 से बढ़कर ₹100 के पार चला गया।
इस महंगाईजनित विफलता को छिपाने के लिए सरकार ने 5 किलो मुफ्त राशन को बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि NFSA के तहत 80 करोड़ से अधिक लोग आज भी मुफ्त अनाज पर निर्भर हैं। यह किसी कल्याणकारी राज्य की सफलता नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि सरकार रोज़गार, आय और महंगाई नियंत्रण में विफल रही है। यदि 12 साल के शासन के बाद भी देश की दो-तिहाई आबादी को मुफ्त राशन की आवश्यकता है, तो यह “अच्छे दिन” नहीं बल्कि गरीबी के संस्थानीकरण (Institutionalisation of Poverty) का संकेत है। PS-PAC के विश्लेषण में साफ़ है—काम, सम्मानजनक आय और सस्ती ज़रूरतें देने के बजाय राशन बाँटना, गरीब को आत्मनिर्भर नहीं बल्कि सरकारी सहारे पर स्थायी रूप से निर्भर बना रहा है।
5. शिक्षा और व्यवस्था विहीन शिक्षा व्यवस्था
मोदी सरकार के 12 वर्षों में शिक्षा व्यवस्था सुधार के बजाय निजीकरण, अव्यवस्था और असमानता का शिकार होती चली गई। केंद्र सरकार के अपने बजट आंकड़ों के अनुसार, शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च आज भी GDP के लगभग 2.9% के आसपास ही सीमित है, जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में इसे 6% तक ले जाने का वादा किया गया था। सरकारी निवेश की इस कमी का सीधा लाभ निजी शिक्षण संस्थानों को मिला। UDISE+ डेटा के अनुसार, 2014 से 2023 के बीच निजी स्कूलों की संख्या में तेज़ बढ़ोतरी हुई, जबकि इसी अवधि में 60,000 से अधिक सरकारी स्कूल बंद या मर्ज कर दिए गए—खासकर ग्रामीण और गरीब इलाकों में।
निजीकरण के इस दौर में निजी स्कूलों की मनमानी फीस वृद्धि आम परिवारों पर भारी पड़ी, वहीं सरकारी स्कूल संसाधनहीन होते चले गए। स्थिति को और गंभीर बनाते हुए मोदी सरकार शिक्षा से जुड़ी सामग्रियों पर भारी अप्रत्यक्ष कर लगाने वाली देश की पहली सरकार बनी। GST लागू होने के बाद किताबों, स्टेशनरी, यूनिफॉर्म, स्कूल बैग, जूते, कोचिंग सेवाओं और ऑनलाइन शिक्षा प्लेटफॉर्म्स पर 5% से 18% तक टैक्स लगाया गया। विभिन्न सरकारी व उद्योग रिपोर्ट्स के अनुसार, 2017 के बाद शिक्षा से जुड़ी वस्तुओं और सेवाओं की कुल लागत में 20–30% तक वृद्धि हुई, जिससे “मुफ़्त और सुलभ शिक्षा” का दावा व्यवहार में खोखला साबित हुआ।
शिक्षक भर्ती की स्थिति और भी चिंताजनक है। केंद्र और राज्य सरकारों के आंकड़ों के मुताबिक, देशभर में 10 लाख से अधिक शिक्षक पद रिक्त हैं, जिससे छात्र–शिक्षक अनुपात लगातार बिगड़ता गया। उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में हालात और बदतर रहे—NEET, UGC-NET, रेलवे और अन्य परीक्षाओं में बार-बार हुए पेपर लीक और घोटालों ने लाखों छात्रों का भविष्य अधर में डाल दिया। AISHE रिपोर्ट बताती है कि डिग्रीधारी युवाओं की संख्या बढ़ने के बावजूद रोज़गार-योग्य कौशल (Employability) में गिरावट आई है, जो व्यावहारिक और कौशल-आधारित पाठ्यक्रमों के अभाव को उजागर करता है। PS-PAC के विश्लेषण में स्पष्ट है कि शिक्षा नीति घोषणाओं और विज्ञापनों तक सीमित रह गई, जबकि ज़मीनी स्तर पर शिक्षा का स्तर, पहुंच और भरोसा—तीनों ही अपने सबसे कमजोर दौर में पहुंच चुके हैं।
6. स्वास्थ्य व्यवस्था खुद कोमा में
मोदी सरकार के 12 वर्षों में भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था सुधार के दावों के बावजूद खुद गंभीर संकट में दिखाई दी, जिसकी सबसे भयावह तस्वीर कोरोना महामारी के दौरान सामने आई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कोविड-19 की दूसरी लहर के समय देश में अस्पताल बेड, ऑक्सीजन और दवाइयों की भारी कमी रही। सरकारी रिकॉर्ड में कोविड से लगभग 5.3 लाख मौतें दर्ज हैं, जबकि WHO की 2022 रिपोर्ट के अनुसार भारत में महामारी से हुई मौतों का वास्तविक आंकड़ा 40 लाख से अधिक हो सकता है। गंगा और अन्य नदियों में तैरती लाशों की तस्वीरें सरकार के “विश्वगुरु” और “सर्वोत्तम प्रबंधन” के दावों पर एक भयावह प्रश्नचिह्न बन गईं।
महामारी ने यह भी उजागर किया कि भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा कितना कमजोर है। नेशनल हेल्थ अकाउंट्स के अनुसार, भारत आज भी स्वास्थ्य पर सिर्फ GDP का लगभग 2.1% ही सार्वजनिक खर्च करता है, जो विश्व औसत और WHO की सिफारिशों से काफी कम है। इसका नतीजा यह हुआ कि इलाज का बोझ आम नागरिक पर पड़ा। NSSO और NFHS डेटा के अनुसार, देश में स्वास्थ्य खर्च का 55% से अधिक हिस्सा लोगों को अपनी जेब से (Out-of-Pocket Expenditure) देना पड़ता है—जिससे हर साल करोड़ों लोग गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिए जाते हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं का बढ़ता निजीकरण इलाज को लगातार महंगा बनाता गया। सरकारी और उद्योग रिपोर्ट्स के अनुसार, 2014 के बाद दवाइयों और इलाज की लागत में 30–40% तक वृद्धि दर्ज की गई, जबकि आय में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के प्रचार के बावजूद ज़मीनी स्तर पर अस्पतालों की कमी, डॉक्टर-नर्स अनुपात की खराब स्थिति और महंगे निजी अस्पतालों की मनमानी बनी रही। PS-PAC के विश्लेषण में स्पष्ट है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय उसे बाज़ार के हवाले कर दिया गया—जिसकी कीमत महामारी के समय देश ने लाशों, असहायता और डर के रूप में चुकाई।
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7. सरकारी जंजीरों में जकड़ी संवैधानिक संस्थाएं
मोदी सरकार के 12 वर्षों में देश की संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर सबसे गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। जिन संस्थाओं का उद्देश्य सत्ता पर निगरानी रखना था, वही संस्थाएं सत्ता के सामने नतमस्तक होती दिखाई दीं। ED, CBI और चुनाव आयोग (EC) जैसी संस्थाओं पर यह आरोप लगातार गहराते गए कि उनका इस्तेमाल विपक्ष को डराने, दबाने और राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है।
सरकारी आंकड़े खुद इस आरोप की पुष्टि करते हैं। ED के आधिकारिक डेटा के अनुसार 2014 से 2024 के बीच 5,000 से अधिक मनी लॉन्ड्रिंग केस दर्ज किए गए, जिनमें से 90% से ज्यादा मामले विपक्षी नेताओं या सरकार-विरोधी आवाज़ों से जुड़े पाए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि इतने बड़े पैमाने पर कार्रवाई के बावजूद सजा की दर 2% से भी कम रही। यानी जांच एजेंसियां कार्रवाई तो कर रही हैं, लेकिन न्यायिक निष्कर्ष लगभग न के बराबर हैं—जो एजेंसियों के दुरुपयोग की ओर सीधा इशारा करता है। CBI को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले ही “पिंजरे का तोता” कहा जा चुका है, और हालिया वर्षों में उसकी भूमिका ने उस टिप्पणी को और प्रासंगिक बना दिया।
सबसे गंभीर सवाल चुनाव आयोग (Election Commission of India) को लेकर उठे हैं, जिसे लोकतंत्र की रीढ़ माना जाता है। विपक्षी दलों ने लगातार EVM, वोट चोरी, आचार संहिता के पक्षपातपूर्ण उल्लंघन और चुनावी शेड्यूल में हेरफेर जैसे आरोप लगाए हैं। ADR (Association for Democratic Reforms) और अन्य निगरानी संस्थाओं के अनुसार, 2019 और 2024 के चुनावों में सत्ताधारी दल द्वारा आचार संहिता उल्लंघन की शिकायतों पर EC की कार्रवाई न्यूनतम या नाममात्र रही, जबकि विपक्षी नेताओं पर त्वरित और कठोर कदम उठाए गए। इसके अलावा, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया से न्यायपालिका को बाहर करना EC की स्वतंत्रता पर एक और बड़ा आघात माना गया।
8. नफरत की राजनीति और बढ़ता हेट स्पीच: समाज को बाँटने की मोदी नीति
मोदी सरकार के 12 वर्षों में देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और हेट स्पीच में खतरनाक बढ़ोतरी देखने को मिली है। भले ही सरकार इसे “छिटपुट घटनाएं” बताती रही हो, लेकिन NCRB (National Crime Records Bureau) के आधिकारिक आंकड़े एक अलग ही कहानी कहते हैं। Crime in India रिपोर्ट के अनुसार, धार्मिक आधार पर दर्ज अपराधों और IPC की धारा 153A (धर्म, जाति या भाषा के आधार पर वैमनस्य फैलाना) के मामलों में 2014 के बाद लगातार वृद्धि दर्ज की गई। 2014 में जहां ऐसे मामलों की संख्या लगभग 800 थी, वहीं 2022 तक यह आंकड़ा बढ़कर 1,500 से अधिक हो गया—यानी लगभग दोगुनी बढ़ोतरी।
अल्पसंख्यकों के खिलाफ अपराधों में भी तेज़ इजाफा हुआ है। NCRB के अनुसार, 2014 से 2022 के बीच अल्पसंख्यकों के खिलाफ अपराधों में लगभग 30–40% की वृद्धि दर्ज की गई। हेट स्पीच के स्रोत को लेकर भी आंकड़े बेहद स्पष्ट हैं। India Hate Lab और अन्य स्वतंत्र निगरानी रिपोर्ट्स के अनुसार, 2019 से 2023 के बीच दर्ज की गई हेट स्पीच की घटनाओं में 65–75% बयान सत्ताधारी BJP के नेताओं, सांसदों, विधायकों और उनसे जुड़े संगठनों द्वारा दिए गए पाए गए। इसके बावजूद नफरत फैलाने वाले भाषणों, खुले धार्मिक उकसावे और हिंसक बयानों पर सरकार और प्रशासन की कार्रवाई बेहद कमजोर रही। सत्ताधारी दल से जुड़े नेताओं पर दर्ज मामलों में या तो कार्रवाई नहीं हुई, या मामले वर्षों तक लंबित रहे।
9. जवाबदेही से पलायन: आज़ादी के बाद की सबसे गैर-जिम्मेदार सरकार
मोदी सरकार के 12 वर्षों का शासनकाल भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में जवाबदेही से योजनाबद्ध दूरी का उदाहरण बनकर उभरा है। बड़े और दूरगामी फैसले बिना तैयारी और बिना संस्थागत विमर्श के लिए गए—चाहे वह नोटबंदी, अचानक घोषित राष्ट्रीय लॉकडाउन, तीन कृषि कानून, या कोरोना प्रबंधन हो। 24 मार्च 2020 को मात्र 4 घंटे की सूचना पर लगाए गए लॉकडाउन से करोड़ों प्रवासी मजदूर सड़कों पर आ गए, लेकिन केंद्र सरकार ने न तो विस्थापन का आधिकारिक आंकड़ा जारी किया, न ही मौतों और मानवीय नुकसान की जिम्मेदारी ली। नीति विफलताओं के बाद जवाबदेही तय करने के बजाय दोष कभी राज्यों पर, कभी पिछली सरकारों पर, तो कभी “वैश्विक परिस्थितियों” पर डाल दिया गया।
इस गैर-जिम्मेदार शासन की सबसे स्पष्ट पहचान शीर्ष नेतृत्व का जनता और मीडिया से संवाद समाप्त कर देना रही है। पिछले 12 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भी स्वतंत्र प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, जबकि इसी अवधि में ‘मन की बात’ के 100 से अधिक एपिसोड और सैकड़ों एकतरफा संबोधन किए गए। संसद में जवाबदेही की स्थिति भी चिंताजनक रही—PRS Legislative Research के अनुसार, लोकसभा की औसत बैठकें पिछले दशकों की तुलना में घटी हैं और हजारों सांसद प्रश्न या तो अस्वीकार किए गए या लिखित जवाबों तक सीमित रहे। इसके साथ ही, RTI कार्यकर्ताओं पर हमलों और सूचना आयोगों में रिक्तियों ने पारदर्शिता को और कमजोर किया।
10. तानाशाही की ओर बढ़ता भारत: लोकतंत्र और संविधान की व्यवस्थित हत्या
मोदी सरकार के 12 वर्षों में भारत का लोकतंत्र केवल आंतरिक आलोचना का विषय नहीं रहा, बल्कि वैश्विक लोकतांत्रिक निगरानी संस्थाओं की रिपोर्ट्स में भी गंभीर गिरावट का प्रतीक बन गया। V-Dem Institute (Sweden) ने अपनी Democracy Report 2021 से लगातार यह दर्ज किया है कि भारत अब “Electoral Democracy” नहीं, बल्कि “Electoral Autocracy” की श्रेणी में आ चुका है। V-Dem के अनुसार, 2014 के बाद भारत में मीडिया की स्वतंत्रता, विपक्ष की भूमिका, नागरिक स्वतंत्रताएं और संस्थागत स्वायत्तता लगातार कमजोर हुई हैं, और यह गिरावट 2019 के बाद और तेज़ हुई। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां लोकतांत्रिक क्षरण (Democratic Backsliding) सबसे अधिक दर्ज किया गया है।
इसी तरह Freedom House की Freedom in the World रिपोर्ट में भारत की स्थिति भी लगातार गिरी है। जहां 2014 में भारत का स्कोर 71/100 था और उसे “Free Democracy” माना जाता था, वहीं 2021 से भारत का स्कोर गिरकर 66/100 हो गया और उसकी श्रेणी बदलकर “Partly Free” कर दी गई। Freedom House ने इस गिरावट के कारणों में सरकारी दबाव में मीडिया, जांच एजेंसियों का राजनीतिक उपयोग, अल्पसंख्यकों के अधिकारों में गिरावट, और विपक्ष के लिए सिकुड़ता लोकतांत्रिक स्पेस को प्रमुख रूप से रेखांकित किया है। PS-PAC के विश्लेषण में स्पष्ट है कि जब चुनाव तो हों, लेकिन संस्थाएं कमजोर कर दी जाएं; संविधान जीवित हो, लेकिन उसकी आत्मा कुचली जाए—तो लोकतंत्र नाम मात्र का रह जाता है। मोदी सरकार के 12 वर्षों में भारत इसी खतरनाक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है, जहां सत्ता का केंद्रीकरण लोकतंत्र पर भारी पड़ता गया है।
11. किसान, जवान, छात्र, व्यापारी और आम जनता विरोधी सरकार
मोदी सरकार के 12 वर्षों में शासन एक ऐसी दिशा में मोड़ दिया गया, जहाँ किसान, जवान, छात्र, छोटे व्यापारी और आम नागरिक लगातार हाशिये पर धकेले गए, जबकि सत्ता और नीतियाँ खुले तौर पर चुनिंदा पूंजीपतियों की बपौती बनती चली गईं। किसानों की आय दोगुनी करने का नारा एक जुमला साबित हुआ—NSSO और कृषि मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि वास्तविक आय में न तो स्थायी वृद्धि हुई और न ही लागत का बोझ कम हुआ। इसके उलट, तीन काले कृषि कानूनों के खिलाफ देश ने आज़ादी के बाद का सबसे लंबा किसान आंदोलन देखा, जिसमें 700 से अधिक किसानों की मौत दर्ज की गई, लेकिन सरकार ने संवेदनहीनता और अहंकार के साथ महीनों तक किसानों को “भटका हुआ” और “राजनीतिक” बताकर बदनाम किया।
जवानों के लिए स्थायी भर्ती, पेंशन और सम्मान की जगह अग्निवीर जैसी अस्थायी और अनिश्चित योजना थोप दी गई, जिसने सेना को भी कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम में धकेल दिया। रक्षा विशेषज्ञों और पूर्व सैन्य अधिकारियों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य मनोबल के लिए खतरनाक बताया, लेकिन सरकार ने उनकी चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया। छात्रों के लिए यह दौर पेपर लीक, परीक्षा रद्द, भर्ती घोटालों और बेरोज़गारी का पर्याय बन गया—CMIE के अनुसार युवा बेरोज़गारी दर लंबे समय तक 20% के आसपास बनी रही, यानी करोड़ों पढ़े-लिखे युवा सरकार की नाकामी की कीमत चुका रहे हैं।
छोटे और मझोले व्यापारी नोटबंदी की आर्थिक तबाही से आज तक उबर नहीं पाए, ऊपर से अव्यवस्थित GST और बढ़ता अनुपालन बोझ उनकी कमर तोड़ता रहा—MSME मंत्रालय के अनुसार लाखों इकाइयां बंद हुईं या अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में धकेल दी गईं। दूसरी ओर, कॉरपोरेट टैक्स में ऐतिहासिक कटौती, सार्वजनिक संपत्तियों का तेजी से निजीकरण और चुनिंदा उद्योगपतियों को नीतिगत संरक्षण देकर सरकार ने साफ संदेश दिया कि यह शासन “जनता का नहीं, पूंजीपतियों का” है। आम नागरिक के लिए महंगाई, महंगी शिक्षा, महंगा इलाज और घटती सामाजिक सुरक्षा एक स्थायी अभिशाप बन चुके हैं—और सरकार हर सवाल से बचने के लिए चुप्पी, प्रचार और ध्रुवीकरण का सहारा लेती रही।
12: विश्व की सबसे भ्रष्ट मीडिया: गोदी मीडिया
मोदी सरकार के 12 वर्षों की लोकतांत्रिक गिरावट, नीतिगत विफलताओं और जनविरोधी फैसलों के पीछे अगर कोई सबसे मज़बूत सुरक्षा कवच रहा है, तो वह है भारत की तथाकथित मुख्यधारा मीडिया—जो अब पत्रकारिता नहीं, सत्ता की प्रचार मशीन बन चुकी है। सरकार इसलिए निरंकुश हो सकी क्योंकि मीडिया ने सवाल पूछना छोड़ दिया, जवाब मांगना छोड़ दिया और संविधान की जगह सत्ता के चरणों में बैठना चुन लिया। World Press Freedom Index (Reporters Without Borders) इसका सबसे ठोस प्रमाण है—2014 में भारत की रैंकिंग जहां लगभग 140 थी, वहीं 2023–24 में यह गिरकर 161–164 के बीच पहुंच गई (180 देशों में)। यह गिरावट किसी एक कानून या घटना की नहीं, बल्कि मीडिया–सत्ता गठजोड़ की सुनियोजित परिणति है।
नोटबंदी की आर्थिक तबाही, कोरोना काल में स्वास्थ्य व्यवस्था का ध्वस्त होना और नदियों में तैरती लाशें, पेगासस जासूसी कांड, चुनावी बॉन्ड के ज़रिये कॉरपोरेट–राजनीति गठजोड़, महंगाई और बेरोज़गारी—इन सब पर मीडिया ने सत्ता से जवाब मांगने की बजाय उसे छिपाने, घुमाने और जायज़ ठहराने का काम किया। प्राइम टाइम बहसें किसानों, छात्रों, बेरोज़गारों और महंगाई से हटाकर नफरत, सांप्रदायिक उकसावे और विपक्षी नेताओं के ट्रायल में बदल दी गईं। एंकर पत्रकार नहीं, सरकार के अनौपचारिक प्रवक्ता बन गए। यही Media–Power Nexus है—जहां सत्ता मीडिया को संरक्षण देती है और मीडिया सत्ता को वैधता। नतीजा यह हुआ कि लोकतंत्र में चौथा स्तंभ प्रहरी नहीं, बल्कि सत्ता की ढाल बन गया—और जब प्रहरी ही बिक जाए, तो सत्ता का निरंकुश होना तय हो जाता है।
PS-PAC का निर्णायक निष्कर्ष: 12 साल का सत्ता-शासन — लोकतंत्र की कीमत पर चला प्रचार का साम्राज्य
मोदी सरकार के 12 वर्षों का यह लेखा-जोखा किसी वैचारिक विरोध या भावनात्मक आक्रोश का नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों, आधिकारिक आंकड़ों और ज़मीनी सच्चाइयों से निकली एक कठोर चार्जशीट है। “अच्छे दिन”, “विश्वगुरु” और “मजबूत नेतृत्व” के आक्रामक प्रचार के पीछे देश ने बेरोज़गारी का ऐतिहासिक संकट, महंगाई की स्थायी मार, किसानों की उपेक्षा, शिक्षा-स्वास्थ्य की बर्बादी, संवैधानिक संस्थाओं की गिरवी स्वायत्तता और लोकतांत्रिक मूल्यों का लगातार क्षरण झेला। सत्ता ने संवाद की जगह एकतरफा भाषण चुना, जवाबदेही की जगह चुप्पी और असहमति की जगह दमन। जब प्रधानमंत्री 12 वर्षों में एक भी स्वतंत्र प्रेस कॉन्फ्रेंस न करे, जब संसद सवाल पूछने की जगह औपचारिकता बन जाए और जब संस्थाएँ सत्ता की ढाल में बदल जाएँ—तो यह शासन नहीं, सत्ता का केंद्रीकृत कब्ज़ा कहलाता है।
PS-PAC (Power Shift – Political Advisory Council) के इस विश्लेषण का निष्कर्ष स्पष्ट और निर्विवाद है: मोदी सरकार का 12 साल का कार्यकाल विकास का नहीं, बल्कि प्रचार, पूंजी और सत्ता गठजोड़ का मॉडल बनकर उभरा है—जहाँ जनता को वोट बैंक, मीडिया को मैनेजमेंट टूल और संस्थाओं को कंट्रोल मैकेनिज़्म बना दिया गया। यह लेख किसी एक चुनाव या दल तक सीमित नहीं है; यह आने वाले भारत के लिए एक चेतावनी है। अगर लोकतंत्र को बचाना है, तो सत्ता से सवाल पूछने होंगे; अगर संविधान को जीवित रखना है, तो संस्थाओं को मुक्त करना होगा; और अगर देश को आगे बढ़ाना है, तो प्रचार नहीं—जवाबदेही, नीति और जनहित को केंद्र में लाना होगा। PS-PAC का यह दस्तावेज़ इतिहास के सामने एक साफ़ रिकॉर्ड है—ताकि कल कोई यह न कह सके कि सब कुछ होते हुए भी, सवाल किसी ने नहीं उठाए।
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