महंगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार: 2014 के वादों से 2026 की हकीकत | PS-PAC विश्लेषण

2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी जिस सबसे मज़बूत राजनीतिक आधार पर सत्ता में आए थे, वह था महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक संघर्ष का वादा। “बहुत हो गया महंगाई का वार” जैसे नारे उस समय केवल चुनावी भाषण नहीं थे, बल्कि यूपीए शासन के दौरान बढ़ती कीमतों, कमजोर होती आमदनी और घोटालों से त्रस्त जनता की वास्तविक पीड़ा की अभिव्यक्ति थे। उसी असंतोष के आधार पर देश ने पहली बार एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार को जनादेश दिया, जिससे अपेक्षा थी कि वह महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण कर आम नागरिक की क्रय-शक्ति को मजबूत करेगी। लेकिन बारह वर्षों के शासन के बाद यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक हो गया है कि जिस मुद्दे पर सत्ता प्राप्त की गई थी, उसी में राहत के बजाय दबाव क्यों बढ़ता चला गया।
“Inflation, unemployment and corruption in India | PS-PAC analysis”
Inflation, Unemployment & Corruption – PS-PAC
    आज महंगाई किसी सांख्यिकीय शब्द तक सीमित नहीं है; यह रसोई गैस, पेट्रोल-डीज़ल, बच्चों की शिक्षा और इलाज के बढ़ते खर्च में सीधे दिखाई देती है। 2014 की तुलना में इन बुनियादी जरूरतों पर होने वाला खर्च जिस स्तर तक बढ़ चुका है, उसने मध्यम और निम्न वर्ग के घरेलू बजट को लगातार संकुचित किया है। PS-PAC (Power Shift – Political Advisory Council) के चुनावी और सामाजिक-आर्थिक आकलन स्पष्ट संकेत देते हैं कि यही आर्थिक दबाव अब महंगाई को केवल आर्थिक समस्या नहीं रहने देता, बल्कि एक गंभीर राजनीतिक प्रश्न में बदल देता है—क्योंकि बारह वर्षों तक सत्ता में रहने के बावजूद उसी महंगाई पर सफाई देना, शासन की प्राथमिकताओं और नीति-दिशा पर मूलभूत सवाल खड़े करता है।

2014 से 2026: सरकारी आँकड़ों में उजागर होती मोदी सरकार की आर्थिक विफलता

सरकारी और अर्ध-सरकारी आँकड़े इस तथ्य को छिपाने में असफल रहे हैं कि 2014 से 2026 के बीच भारत का आम नागरिक अभूतपूर्व आर्थिक दबाव में आ गया है। पेट्रोलियम मंत्रालय के आधिकारिक डेटा के अनुसार 2014 में जहाँ पेट्रोल की औसत कीमत 65–70 रुपये प्रति लीटर थी, वहीं 2026 तक यह 100 रुपये प्रति लीटर से ऊपर स्थायी वास्तविकता बन चुकी है; डीज़ल की कीमतें भी लगभग दोगुनी हो चुकी हैं। घरेलू एलपीजी सिलेंडर, जिसकी कीमत 2014 में 400–450 रुपये के बीच थी, 2026 में 1000 रुपये के आसपास पहुँच चुकी है, जबकि सब्सिडी लगभग समाप्त कर दी गई है—जिसका सीधा असर रसोई बजट पर पड़ा है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MOSPI) का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) यह स्पष्ट करता है कि खाद्य पदार्थों, ईंधन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी आवश्यक सेवाओं में महंगाई लगातार ऊँचे स्तर पर बनी हुई है, जिससे वास्तविक आय (Real Wages) में गिरावट दर्ज की गई है और क्रय-शक्ति कमजोर हुई है।
PS-PAC infographic on rising inflation, unemployment and corruption in India
PS-PAC: Rising Inflation, Unemployment & Corruption in India
    रोज़गार के मोर्चे पर स्थिति और अधिक चिंताजनक है। पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) और CMIE के आँकड़े दर्शाते हैं कि युवाओं में बेरोज़गारी दर कई वर्षों तक दोहरे अंकों में बनी रही, जबकि श्रम-बल भागीदारी दर में ठोस सुधार नहीं हुआ। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़ा है, लेकिन उसका परिणाम गुणवत्तापूर्ण रोजगार के रूप में सामने नहीं आया—जिससे डिग्रीधारी बेरोज़गारों की संख्या ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच गई है। भ्रष्टाचार और काले धन के प्रश्न पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टें बार-बार यह संकेत देती रही हैं कि वित्तीय अनियमितताएँ समाप्त होने के बजाय अधिक केंद्रीकृत, तकनीकी और अपारदर्शी होती गई हैं। इस प्रकार 2014 में जिन मुद्दों—महंगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार—को सत्ता परिवर्तन का नैतिक आधार बनाया गया था, 2026 तक वही समस्याएँ और अधिक व्यापक होकर उभरी हैं, जिससे महंगाई अब केवल आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि मोदी शासन की नीति-प्राथमिकताओं और जवाबदेही पर सीधा राजनीतिक आरोप बन चुकी है।

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2026–27 में महंगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार क्यों बन सकते हैं निर्णायक चुनावी मुद्दे

2026–27 के चुनावी परिदृश्य में महंगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि ये तीनों मुद्दे अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। बढ़ती महंगाई ने जहाँ आम नागरिक के दैनिक खर्च को असहनीय बनाया है, वहीं रोजगार के सीमित अवसर और आय-वृद्धि की धीमी गति ने इस दबाव को और तीव्र कर दिया है। जब आय स्थिर रहे, नौकरी की सुरक्षा कमजोर हो और आवश्यक वस्तुओं व सेवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती जाएँ, तो आर्थिक असंतोष स्वाभाविक रूप से राजनीतिक असंतोष में परिवर्तित होने लगता है।
PS-PAC (Power Shift – Political Advisory Council) के चुनावी और सामाजिक-आर्थिक आकलन संकेत देते हैं कि बेरोज़गारी, विशेषकर युवाओं और शिक्षित वर्ग में, महंगाई के प्रभाव को कई गुना बढ़ा रही है। रोजगार न मिलने या कम वेतन वाली अस्थायी नौकरियों में फँसे युवा वर्ग के लिए बढ़ती कीमतें केवल आर्थिक समस्या नहीं रह जातीं, बल्कि भविष्य की अनिश्चितता का प्रतीक बन जाती हैं। इसी संदर्भ में भ्रष्टाचार का प्रश्न भी पुनः उभरता है, क्योंकि जब आम नागरिक पर आर्थिक बोझ बढ़ता है और उसके बदले सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार नहीं दिखता, तो शासन की पारदर्शिता और संसाधनों के उपयोग पर संदेह गहराता है।
महत्वपूर्ण यह है कि 2014 में इन्हीं तीन मुद्दों—महंगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार—के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष का वादा कर सत्ता परिवर्तन हुआ था। बारह वर्षों के शासन के बाद भी यदि यही समस्याएँ और अधिक व्यापक और संरचनात्मक रूप में मौजूद हों, तो तुलना अपरिहार्य हो जाती है। यही तुलना 2026–27 के चुनावी विमर्श में एक केंद्रीय आधार बन सकती है, जहाँ मतदाता यह प्रश्न उठाने लगेगा कि क्या लंबे शासन के बावजूद उसकी आर्थिक सुरक्षा, रोजगार के अवसर और शासन की ईमानदारी में वास्तविक सुधार हुआ है।

निष्कर्ष: जिस वादे पर सत्ता मिली, उसी पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न

महंगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार को आज अलग-अलग प्रशासनिक चुनौतियों के रूप में नहीं, बल्कि एक साझा शासन-परिणाम के रूप में देखा जाना चाहिए। 2014 में इन्हीं मुद्दों पर निर्णायक समाधान का भरोसा देकर सत्ता प्राप्त की गई थी, लेकिन बारह वर्षों के बाद यही प्रश्न सबसे प्रखर रूप में सामने आता है कि क्या शासन की प्राथमिकताओं ने वास्तव में आम नागरिक की आर्थिक सुरक्षा और अवसरों को केंद्र में रखा। जब लगातार बढ़ते खर्च, अस्थिर रोजगार और सार्वजनिक संसाधनों की पारदर्शिता पर उठते सवाल एक साथ मौजूद हों, तो यह केवल नीतिगत चूक नहीं, बल्कि शासन-दृष्टि की परीक्षा बन जाती है।
PS-PAC (Power Shift – Political Advisory Council) के चुनावी और सामाजिक-आर्थिक आकलन संकेत देते हैं कि 2026–27 की राजनीति में मतदाता केवल वादों या स्पष्टीकरणों का मूल्यांकन नहीं करेगा, बल्कि पिछले एक दशक के ठोस परिणामों की तुलना उस मूल अपेक्षा से करेगा, जिसके आधार पर सत्ता को वैधता मिली थी। यही तुलना महंगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार को साधारण मुद्दों से ऊपर उठाकर निर्णायक राजनीतिक प्रश्न में बदल देती है। इस संदर्भ में आगामी चुनाव किसी एक कार्यकाल का नहीं, बल्कि उस मूल वादे का जनमत बनते दिखाई दे रहे हैं—जिस पर सत्ता की नींव रखी गई थी और जिस पर आज सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा है।

 

 

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