PS-PAC (Power Shift – Political Advisory Council) ने विगत कुछ वर्षों से लगातार उत्तर प्रदेश में होने वाले हर चुनाव पर अपनी सीट-वाइज और बूथ-वाइज ट्रैकिंग रखी है और प्रत्येक चुनाव परिणाम का गहन अध्ययन और उसका विश्लेषण किया है उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति PS-PAC के लिए रणनीतिक हस्तक्षेप का प्राथमिक क्षेत्र रहा है उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस की हार का कारण समर्थन की अनुपस्थिति ही नहीं, बल्कि डेटा-आधारित चुनावी हस्तक्षेप का अभाव भी रहा है। उदाहरण के तौर पर, बिलासपुर विधानसभा (रामपुर) पर आधारित PS-PAC की विस्तृत रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि 2017 और 2022 के चुनावों में कांग्रेस का वोट प्रतिशत कई बूथों पर निर्णायक स्तर पर मौजूद था, लेकिन जातीय वोट ट्रांसफर, विपक्षी वोटों के विभाजन और बूथ-स्तरीय संगठन की कमी के कारण यह वोट सीट में परिवर्तित नहीं हो सका।
![]() |
| PS-PAC Uttar Pradesh Assembly Election Strategy Report |
इसी रिपोर्ट में प्रत्येक प्रमुख जातीय समूह, उनका अनुमानित प्रतिशत, भाजपा-सपा के पारंपरिक वोट पॉकेट्स, और उन 12–15 निर्णायक बूथों की पहचान की गई है जहाँ हस्तक्षेप से परिणाम बदला जा सकता था। यही मॉडल—वोट-शेयर ब्रेकअप, जातीय जनसंख्या अनुमान, बूथ-वाइज कमजोरी-ताकत विश्लेषण और उम्मीदवार-केंद्रित रणनीति—PS-PAC द्वारा उत्तर प्रदेश की किसी भी विधानसभा सीट पर लागू किया जा सकता है। यह एजेंसी चुनाव को भाषण या पोस्टर का खेल नहीं, बल्कि संख्याओं, सामाजिक यथार्थ और ज़मीनी ऑपरेशन का विषय मानती है—और इसी कारण PS-PAC की रणनीति सिर्फ दावा नहीं, बल्कि कई चुनावी परिदृश्यों में लागू की गई पद्धति पर आधारित है।
इसे भी पढ़ें : UP विधानसभा चुनाव 2027: PS-PAC का संपूर्ण चुनावी रणनीतिक ढांचा
कांग्रेस की हार के वास्तविक कारण और PS-PAC का हस्तक्षेप मॉडल
PS-PAC द्वारा तैयार बिलासपुर विधानसभा (रामपुर) की रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि कांग्रेस की हार का मूल कारण भाजपा की अपराजेयता नहीं, बल्कि कांग्रेस के वोट का रणनीतिक रूप से असंगठित रह जाना है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस का कुल वोट प्रतिशत कई बूथों पर 8–15 प्रतिशत के बीच रहा, जो अपने आप में निर्णायक नहीं था, लेकिन यदि इसे सटीक जातीय समूहों और स्थानीय असंतोष वाले क्षेत्रों में केंद्रित किया जाता, तो मुकाबला त्रिकोणीय से सीधा किया जा सकता था। PS-PAC के बिलासपुर विधानसभा चुनाव 2027 के संदर्भ में दिए गए आंकड़े बताते है कि कांग्रेस ने न तो यह पहचाना कि की कौन-से बूथों पर भाजपा की जीत का मार्जिन 3–6 हजार के भीतर था, न ही यह तय किया कि किन सामाजिक समूहों (विशेषकर पिछड़ा, अल्पसंख्यक और उपेक्षित स्थानीय वर्ग) को लक्षित कर वोट ट्रांसफर कराया जा सकता था। PS-PAC इसी कमजोरी पर हस्तक्षेप करता है—एजेंसी पहले सीट-वाइज हार के मार्जिन, विपक्षी वोट-डिवीजन और निर्णायक बूथों की पहचान करती है, फिर उसी के अनुसार उम्मीदवार, संगठन और संदेश को एक दिशा में लाती है। परिणामस्वरूप कांग्रेस का बिखरा हुआ वोट एक रणनीतिक वोट-ब्लॉक में बदलता है, जिससे जीत की संभावना मात्र सैद्धांतिक नहीं, बल्कि संख्यात्मक रूप से प्राप्त करने योग्य बन जाती है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की राजनीति : ज़मीनी संरचना, चुनावी आँकड़े और यथार्थ
उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझना केवल चुनावी आँकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि हर विधानसभा की सामाजिक बनावट, स्थानीय प्रभाव और मतदान व्यवहार को ज़मीन पर कैसे पढ़ा गया है। PS-PAC (Power Shift – Political Advisory Council) का अध्ययन इसी आधार पर विकसित हुआ है। बिलासपुर विधानसभा सीट का विश्लेषण, जिसका उल्लेख इस संदर्भ में केवल उदाहरण भर है, यह संकेत देता है कि बूथ-स्तर के रुझान, निर्णायक सामाजिक समूह और सीमित जीत-हार का अंतर अक्सर किसी सीट की वास्तविक कहानी कह देता है। इसी प्रकार की सूक्ष्म समझ प्रदेश की अन्य विधानसभा सीटों पर भी विकसित की गई है, जहाँ हर सीट को अलग राजनीतिक इकाई मानकर देखा गया है। यह दृष्टि किसी एक दल या चुनाव तक सीमित नहीं रहती; इसमें सभी प्रमुख राजनीतिक दलों और उनके संभावित उम्मीदवारों की स्थिति, ताकत और सीमाओं का वास्तविक स्थिति शामिल होता है। जब किसी सीट का यह पूरी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट हो जाता है, तो रणनीति अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस राजनीतिक वास्तविकताओं के आधार पर आकार लेती है।
निष्कर्ष : रणनीति ही अब राजनीति का निर्णायक तत्व है
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और जटिल राजनीतिक राज्य में विधानसभा चुनाव जीतना अब किसी एक मुद्दे, चेहरे या अभियान पर निर्भर नहीं रहा। यहाँ परिणाम तय होते हैं सीट-स्तर की समझ, सामाजिक संरचना के सही विश्लेषण और बूथ-स्तरीय संगठन से। PS-PAC (Power Shift – Political Advisory Council) द्वारा विकसित उत्तर प्रदेश मॉडल इसी यथार्थ से निकला हुआ है, जिसमें वोट-शेयर, जातीय संतुलन, निर्णायक बूथ और स्थानीय राजनीतिक व्यवहार—सभी को एक साथ देखा जाता है। बिलासपुर जैसी सीटों के अध्ययन से लेकर पूरे प्रदेश की विधानसभा संरचना तक, यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस की स्थिति कई जगह कमजोर नहीं, बल्कि रणनीतिक हस्तक्षेप के अभाव में अप्रयुक्त रही है। आने वाला 2027 का विधानसभा चुनाव सभी पार्टियों के लिए चुनौतिपूर्ण होगा, और यह तय करेगा कि उत्तर प्रदेश की राजनीति अनुमान के सहारे चलती रहेगी या गहन अध्ययन और व्यावहारिक रणनीति के आधार पर नए संतुलन बनाए जाएँगे ।
इस संदर्भ में यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में चुनाव अब न तो संयोग से जीते जाते हैं और न ही केवल भावनात्मक अपील से। आने वाले चुनावों में वही राजनीतिक दृष्टि प्रभावी होगी जो सीट-स्तर की वास्तविकताओं, सामाजिक गणित और बूथ-स्तरीय तैयारी को एक साथ साध सके। यह बदलाव उत्तर प्रदेश की राजनीति को अनुमान से निकालकर रणनीति के युग में ले जा रहा है, जहाँ जीत उसी के पक्ष में जाएगी जो ज़मीनी यथार्थ को समय रहते पहचानकर उस पर काम करेगा।

0 Comments