उच्च शिक्षा में समानता और सामाजिक न्याय का प्रश्न केवल वैचारिक नहीं, बल्कि सांख्यिकीय रूप से भी दर्ज वास्तविकता है। यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय के ही आंकड़ों के अनुसार, देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पिछले एक दशक में जातिगत भेदभाव से जुड़ी हज़ारों शिकायतें दर्ज हुई हैं, जबकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट बताती है कि शैक्षणिक परिसरों से जुड़े आत्महत्या मामलों में एक बड़ा अनुपात सामाजिक उत्पीड़न के आरोपों से जुड़ा रहा है। इन्हीं पृष्ठभूमियों को आधार बनाकर UGC ने 2026 में नए नियमों का मसौदा प्रस्तुत किया, जिसे सरकार ने ‘समान अवसर’ और ‘समावेशी शिक्षा’ की दिशा में एक निर्णायक सुधार के रूप में प्रचारित किया। सतह पर देखें तो यह एक आवश्यक हस्तक्षेप प्रतीत होता है, जिस पर असहमति का कोई सहज कारण नहीं दिखता।
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| UGC BILL| PS PAC Analysis |
लेकिन जिस तेज़ी से यह बिल सामने आया, और जिस तरह इसने कुछ ही दिनों में अगड़ी बनाम पिछड़ी जातियों की बहस को देश के शैक्षणिक विमर्श के केंद्र में ला दिया—और फिर लगभग उतनी ही तेजी से सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पर रोक लगा दी गई—उसने इस पूरी प्रक्रिया को साधारण नीतिगत सुधार से आगे खड़ा कर दिया। PS-PAC Analysis के अनुसार, यह घटनाक्रम उस दौर की याद दिलाता है जब 1990 के दशक में मंडल–कमंडल की राजनीति ने आर्थिक संकट, बेरोज़गारी और शासन की विफलताओं से ध्यान हटाकर जातिगत ध्रुवीकरण को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बना दिया था। आज, जब देश का एक बड़ा शिक्षित वर्ग बेरोज़गारी दर के 8% से ऊपर बने रहने, उच्च शिक्षा में निजीकरण और संस्थागत गिरावट जैसे मुद्दों पर सवाल पूछ रहा है, तब जातिगत पहचान को पुनः राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ले आना केवल संयोग नहीं, बल्कि विमर्श को मोड़ने की रणनीति भी हो सकता है। यहीं से यह विवाद नीति से आगे बढ़कर राजनीति का मामला बन जाता है।
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विवाद की राजनीति: जवाबदेही से बचने का जातिगत रास्ता
आँकड़े साफ़ बताते हैं कि जब भी सार्वजनिक विमर्श रोज़गार, महंगाई, शिक्षा की गिरती गुणवत्ता और शासन की जवाबदेही जैसे असहज सवालों की ओर बढ़ता है, ठीक उसी समय पहचान-आधारित मुद्दों को राजनीतिक मंच के केंद्र में ला दिया जाता है। आज देश में कुल बेरोज़गारी दर 8% के आसपास अटकी हुई है, युवा बेरोज़गारी इससे कहीं ज़्यादा है; उच्च शिक्षा पर सरकारी खर्च GDP के अनुपात में घटता जा रहा है और निजीकरण ने विश्वविद्यालयों को आम परिवारों की पहुँच से बाहर कर दिया है। ऐसे माहौल में नीति-निर्माण पर कठोर सवाल उठना स्वाभाविक था—लेकिन मौजूदा UGC विवाद ने बहस की दिशा ही बदल दी।
जैसे ही नियम लागू हुए, विमर्श तुरंत अगड़ी बनाम पिछड़ी के खांचे में धकेल दिया गया; शिक्षा की संरचना, संस्थागत विफलताएँ और जवाबदेही की माँगें हाशिये पर चली गईं। यही राजनीतिक तकनीक दशकों से काम करती आई है—विवाद पैदा करो, समाज को खेमों में बाँटो, और शोर के बीच सवालों को गुम कर दो। मंडल–कमंडल के दौर में जिसने सत्ता को वास्तविक मुद्दों से बच निकलने का रास्ता दिया था, वही फ़ॉर्मूला आज नए पैकेज में दोहराया जाता दिखाई देता है—जहाँ टकराव राजनीतिक ऊर्जा बनता है और जनता के मूल प्रश्न फिर से टाल दिए जाते हैं।
नीति की खामियाँ या जानबूझकर छोड़े गए छेद?
UGC नियमों का सबसे परेशान करने वाला पहलू उनका उद्देश्य नहीं, बल्कि उनकी रचना है। जिस मसौदे को देश की सबसे संवेदनशील सामाजिक संरचना पर लागू किया जाना था, उसमें न तो भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा है, न निष्पक्ष जाँच की मजबूत प्रक्रिया और न ही झूठी शिकायतों से बचाव का कोई ठोस तंत्र। नीति जितनी अस्पष्ट होती है, उसका राजनीतिक उपयोग उतना ही आसान हो जाता है—क्योंकि अस्पष्टता सवाल नहीं, विवाद पैदा करती है। यही कारण है कि यह नियम सुधार कम और टकराव ज़्यादा पैदा करता दिखा। अगर मंशा वास्तव में सामाजिक न्याय की होती, तो ड्राफ्ट में संतुलन, पारदर्शिता और सभी पक्षों के लिए समान सुरक्षा प्राथमिकता होती। यहाँ जो दिखाई देता है, वह अधूरापन नहीं, बल्कि रणनीतिक खालीपन है—ऐसा खालीपन जो बहस को संस्थागत सुधार से हटाकर जातिगत संघर्ष की ओर मोड़ देता है।
यहाँ कुछ बुनियादी सवाल खुद खड़े हो जाते हैं:
- भेदभाव की परिभाषा जानबूझकर इतनी व्यापक और धुंधली क्यों रखी गई?
- सभी वर्गों के लिए समान शिकायत तंत्र क्यों नहीं बनाया गया?
- झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर स्पष्ट दंड का प्रावधान क्यों हटाया गया?
- यदि उद्देश्य न्याय था, तो प्रक्रिया इतनी असंतुलित क्यों दिखती है?
संस्थाओं की कीमत पर कब तक राजनीति?
इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी क़ीमत न सरकार चुका रही है, न राजनीतिक दल—बल्कि देश की शैक्षणिक संस्थाएँ चुका रही हैं। UGC नियमों को लेकर पैदा हुए असमंजस ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में एक ऐसा माहौल बना दिया है जहाँ प्रशासन निर्णय लेने से डर रहा है, शिक्षक संदेह के घेरे में हैं और छात्र आपसी अविश्वास में बँटते जा रहे हैं। जेएनयू, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और देश के कई केंद्रीय विश्वविद्यालय पहले ही वैचारिक और राजनीतिक दबावों से जूझ रहे हैं; ऐसे में यह विवाद उनके भीतर पहले से मौजूद तनाव को और गहरा करता है। शिक्षा का परिसर, जो विचार, बहस और असहमति का केंद्र होना चाहिए था, धीरे-धीरे भय, खेमेबंदी और आत्म-सेंसरशिप की जगह बनता जा रहा है।
इसका असर तत्काल दिखता है—शिकायतों के डर से अकादमिक स्वतंत्रता सिमटती है, शिक्षक-छात्र संवाद औपचारिक और सतही हो जाता है, और संस्थान शिक्षा सुधार के बजाय विवाद प्रबंधन में उलझ जाते हैं। जेएनयू और एएमयू जैसे संस्थानों के उदाहरण दिखाते हैं कि जब शिक्षा को बार-बार राजनीतिक संघर्ष का मैदान बनाया जाता है, तो नुकसान संस्थागत विश्वसनीयता का होता है और लाभ राजनीति को मिलता है। संस्थाएँ कमजोर होती हैं, बहस बिखरती है और शासन से जुड़े मूल प्रश्न—बेरोज़गारी, शिक्षा की गुणवत्ता, संसाधनों की कमी—पीछे छूट जाते हैं। सवाल यह नहीं कि सुधार ज़रूरी हैं या नहीं; सवाल यह है कि क्या हर बार सुधार की आड़ में संस्थानों को अस्थिर करके राजनीति करना ही एकमात्र रास्ता बचा है? यही प्रश्न इस पूरे विवाद के केंद्र में है।
PS-PAC चेतावनी: जब शिक्षा मोहरा बने और सत्ता खिलाड़ी
यह पूरा विवाद किसी एक नियम, किसी एक अदालती आदेश या किसी एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है। यह उस सुनियोजित राजनीतिक प्रवृत्ति का हिस्सा है जिसमें शिक्षा, संस्थाएँ और पहचान—तीनों को सत्ता की शतरंज पर मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जाता है। PS-PAC के विश्लेषण में यह साफ़ उभरता है कि जब भी सरकारें वास्तविक सवालों—बेरोज़गारी, शिक्षा की गुणवत्ता, संसाधनों की कमी और सामाजिक गतिशीलता—का सामना करने में असहज होती हैं, तब जातिगत और वैचारिक ध्रुवीकरण सबसे आसान हथियार बना दिया जाता है। मंडल-कमंडल के दौर से लेकर आज के UGC विवाद तक, पैटर्न बदला नहीं है—बस चेहरे और शब्दावली बदल गई है।
लोकतंत्र में सुधार ज़रूरी हैं, संस्थानों पर सवाल उठना भी चाहिए—लेकिन अगर हर “सुधार” भय पैदा करे, हर बहस समाज को बाँटे और हर हस्तक्षेप अदालत की दहलीज़ तक पहुँचकर रुके, तो यह प्रशासनिक भूल नहीं बल्कि राजनीतिक रणनीति है। सवाल अब नियमों की तकनीकी वैधता का नहीं, लोकतांत्रिक मंशा का है। PS-PAC का स्पष्ट निष्कर्ष यही है: अगर शिक्षा और संस्थाएँ यूँ ही सत्ता की राजनीति की कीमत चुकाती रहीं, तो आने वाली पीढ़ियाँ सिर्फ़ डिग्रियाँ नहीं खोएँगी—वे सवाल पूछने की क्षमता भी खो देंगी। और किसी भी लोकतंत्र के लिए यही सबसे खतरनाक क्षण होता है।

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