बजट 2026 को सरकार ने आर्थिक स्थिरता, तेज़ विकास और दीर्घकालिक लक्ष्यों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। इस बजट में अवसंरचना पर बड़े निवेश, मैन्युफैक्चरिंग और स्टार्टअप को प्रोत्साहन, युवाओं के लिए इंटर्नशिप और स्किल कार्यक्रम, शहरी विकास, वैकल्पिक परिवहन व्यवस्था तथा “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य को केंद्र में रखकर कई नई घोषणाएँ की गई हैं। सरकार का दावा है कि यह बजट रोज़गार सृजन को गति देगा, भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाएगा और आने वाले दशकों में देश को एक विकसित राष्ट्र की श्रेणी में ले जाने की नींव रखेगा।
“यह बजट अपार अवसरों का राजमार्ग है। यह वर्तमान के सपनों को साकार करता है और भारत के उज्ज्वल भविष्य की नींव को सशक्त करता है। यह बजट 2047 के विकसित भारत की हमारी ऊँची उड़ान का आधार है।”— प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
![]() |
| Budget 2026 : PS-PAC Analysis |
नई योजनाएँ या पुरानी स्कीमों का पुनर्पैकेज?
बजट 2026 के भाषण में जिन “नई योजनाओं” की घोषणा की गई है, उन पर सरसरी नज़र डालने से यह आभास होता है कि सरकार नीतिगत नवाचार की दिशा में आगे बढ़ रही है। लेकिन यदि इन घोषणाओं की तुलना पिछले बजट भाषणों और पूर्ववर्ती योजनाओं से की जाए, तो एक अलग ही तस्वीर उभरती है। युवाओं के लिए घोषित नई इंटर्नशिप और स्किल योजनाएँ, पहले से लागू Skill India, PM Kaushal Vikas Yojana और पूर्व इंटर्नशिप पायलट प्रोजेक्ट्स की ही विस्तारित या पुनःनामित संरचनाएँ प्रतीत होती हैं। इसी तरह शहरी विकास, वैकल्पिक परिवहन, जलमार्ग और मैन्युफैक्चरिंग को लेकर की गई घोषणाएँ भी Smart Cities Mission, Make in India, Sagarmala और National Waterways Programme जैसे पुराने कार्यक्रमों की निरंतरता से आगे बढ़कर कोई मौलिक नीति परिवर्तन नहीं दिखातीं। बजट भाषण में शब्दावली भले ही बदली हुई हो, लेकिन नीति का मूल ढाँचा, लक्ष्य निर्धारण और कार्यान्वयन की रणनीति काफी हद तक पहले जैसी ही नज़र आती है। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि योजनाएँ घोषित हुईं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या बजट 2026 वास्तव में पुराने अनुभवों से सीख लेकर कोई नया समाधान प्रस्तुत करता है, या फिर वही पुरानी स्कीमें नए नामों और नए दावों के साथ दोहराई जा रही हैं।
सी-प्लेन परियोजना: घोषणा बार-बार, ज़मीन पर नतीजा शून्य
सी-प्लेन सेवा को पहली बार 2020 में गुजरात के साबरमती-केवड़िया रूट पर शुरू किया गया था, जिसे सरकार ने पर्यटन और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी की दिशा में बड़ा कदम बताया। लेकिन यह सेवा केवल 4-6 सप्ताह ही चल सकी और 2021 में आर्थिक व परिचालन कारणों से बंद हो गई। उपलब्ध सरकारी व मीडिया आंकड़ों के अनुसार इस पायलट परियोजना पर करीब ₹7.7 करोड़ खर्च किए गए, लेकिन इसके बाद किसी अन्य रूट पर नियमित सी-प्लेन सेवा शुरू नहीं हो पाई।
इसके बावजूद, बजट 2026 में सी-प्लेन परियोजना को एक बार फिर नए वादों के साथ शामिल किया गया है। जबकि 2025-26 तक देश में कोई भी नियमित, व्यावसायिक सी-प्लेन सेवा संचालित नहीं है, और 2020 की वही एकमात्र परीक्षण सेवा इसका एकमात्र उदाहरण रही है। यह स्थिति इस सवाल को मजबूती देती है कि क्या बजट 2026 में सी-प्लेन वास्तव में नई रणनीति के साथ लौट रहा है, या फिर यह एक बार फिर पुरानी असफल योजना को नए शब्दों में पेश करने का प्रयास मात्र है।
पीएम इंटर्नशिप योजना: रोज़गार समाधान या आंकड़ों का खेल?
पीएम इंटर्नशिप योजना को बजट 2026 में युवाओं के लिए रोज़गार-उन्मुख कदम के रूप में पेश किया गया है, लेकिन इसका ढांचा पहले से चल रही National Apprenticeship Promotion Scheme (NAPS) और National Apprenticeship Training Scheme (NATS) से काफी मिलता-जुलता है। NAPS के तहत सरकार ने 1 करोड़ अप्रेंटिस जोड़ने का लक्ष्य रखा था, जबकि उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2016–2023 के बीच लगभग 60–65 लाख युवाओं का ही पंजीकरण हो पाया, जिनमें से स्थायी रोजगार पाने वालों की संख्या इससे भी कम रही। यानी लक्ष्य और वास्तविक भागीदारी के बीच बड़ा अंतर बना रहा।
बजटीय स्तर पर भी यही पैटर्न दिखता है। NAPS/NATS के लिए पिछले वर्षों में हज़ारों करोड़ रुपये का आवंटन किया गया, लेकिन प्लेसमेंट-आउटपुट अनुपात सीमित रहा। बजट 2026 में पीएम इंटर्नशिप योजना के लिए नए लक्ष्य और नई भाषा ज़रूर दिखती है, पर अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि पिछले अप्रेंटिसशिप कार्यक्रमों की कम भागीदारी, कमजोर उद्योग-लिंक और अस्थायी इंटर्नशिप जैसी समस्याओं को कैसे दूर किया जाएगा। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि इंटर्नशिप ज़रूरी है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह योजना वास्तविक रोज़गार पैदा करेगी या फिर पहले से मौजूद योजनाओं के आंकड़ों को नए नाम से प्रस्तुत करने तक ही सीमित रह जाएगी।
स्मार्ट सिटी से सिटी इकोनॉमिक ज़ोन तक: नाम बदला, मॉडल वही?
बजट 2026 में सरकार ने “City Economic Zones” को शहरी विकास और रोज़गार सृजन का नया इंजन बताया है। लेकिन यदि इसके ढांचे को देखा जाए, तो यह अवधारणा काफी हद तक Smart City Mission, AMRUT और औद्योगिक क्लस्टर मॉडल से मिलती-जुलती दिखाई देती है—जहाँ चुनिंदा शहरों या शहरी हिस्सों में इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और सेवाओं को केंद्रित किया जाता है। स्मार्ट सिटी मिशन के तहत पहले ही 100 शहरों में ₹1.5 लाख करोड़ से अधिक खर्च किए जा चुके हैं, फिर भी व्यापक शहरी आर्थिक परिवर्तन सीमित रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि नया “सिटी इकोनॉमिक ज़ोन” मॉडल संरचना में कितना अलग है।
सबसे अहम बात यह है कि बजट 2026 में सिटी इकोनॉमिक ज़ोन के लिए न तो स्पष्ट संख्या बताई गई है, न ही अलग से ठोस बजटीय आवंटन, और न ही यह साफ किया गया है कि पिछली शहरी योजनाओं की कमियों—जैसे असमान विकास, सीमित रोज़गार प्रभाव और परियोजनाओं की देरी—को कैसे दूर किया जाएगा। जब स्मार्ट सिटी जैसे बड़े कार्यक्रम के बावजूद शहरों में आर्थिक अवसर व्यापक रूप से पैदा नहीं हो सके, तब केवल एक नया नाम और नया विज़न पेश करना यह आशंका पैदा करता है कि कहीं सिटी इकोनॉमिक ज़ोन भी एक और “रीब्रांडेड शहरी प्रयोग” बनकर न रह जाए।
मैन्युफैक्चरिंग के 7 कर्तव्य: पुराने मेक इन इंडिया की नई पैकेजिंग?
2014 में मेक इन इंडिया की शुरुआत इस लक्ष्य के साथ हुई थी कि GDP में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 25% तक पहुँचाई जाएगी, लेकिन उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024–26 तक यह हिस्सा लगभग 15–16% के आसपास ही बना हुआ है। यानी एक दशक बाद भी भारत का विनिर्माण क्षेत्र न तो संरचनात्मक छलांग लगा पाया और न ही वैश्विक सप्लाई चेन में अपेक्षित स्थान बना सका। रोज़गार के मोर्चे पर भी तस्वीर सीमित रही—मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े नेट नए रोजगार अपेक्षाकृत कम रहे, जबकि असंगठित क्षेत्र पर निर्भरता बनी रही।
बजट 2026 में सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग को गति देने के लिए “मैन्युफैक्चरिंग के 7 कर्तव्यों” (जैसे लॉजिस्टिक्स सुधार, MSME सपोर्ट, टेक्नोलॉजी, स्किल, एक्सपोर्ट, ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस आदि) की बात की है। लेकिन यह भी तथ्य है कि 2014 के बाद आयात निर्भरता कई क्षेत्रों—इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, मशीनरी—में घटी नहीं बल्कि बढ़ी है, खासकर चीन से आयात के मामले में। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये 7 कर्तव्य वास्तव में नीति में ठोस बदलाव लाएँगे, या फिर यह मेक इन इंडिया के उसी अधूरे एजेंडे को नए शब्दों में दोहराने का प्रयास है।
स्किल इंडिया से ‘7 कर्तव्यों’ तक: सर्टिफिकेट, घोटाले और अधूरा रोजगार एजेंडा
स्किल इंडिया मिशन के तहत 2015 से अब तक करोड़ों युवाओं को ट्रेनिंग और सर्टिफिकेशन देने का दावा किया गया है, लेकिन आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि स्थायी रोजगार पाने वालों का अनुपात बेहद सीमित रहा। कई मामलों में ट्रेनिंग के बाद प्लेसमेंट या तो अस्थायी रहा या बिल्कुल नहीं हुआ, जिससे “स्किल बनाम जॉब” का अंतर लगातार बना रहा। इसी पृष्ठभूमि में बजट 2026 में मैन्युफैक्चरिंग के ‘7 कर्तव्यों’ को पेश किया गया है, जहाँ स्किल को विनिर्माण विस्तार की रीढ़ बताया गया है—लेकिन पिछला अनुभव बताता है कि केवल ट्रेनिंग संख्या बढ़ाने से औद्योगिक क्षमता अपने आप नहीं बनती।
CAG की रिपोर्टों ने स्किल इंडिया की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल उठाए हैं—जैसे फर्जी ट्रेनिंग आंकड़े, उद्योग की वास्तविक मांग से कटे कोर्स, निजी ट्रेनिंग एजेंसियों में अनियमितताएँ और प्लेसमेंट डेटा की पारदर्शिता का अभाव। इसका असर मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में भी दिखता है। उदाहरण के तौर पर, बजट 2026 में कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की बात की गई है, जबकि वैश्विक स्तर पर चीन आज 90% से अधिक शिपिंग कंटेनरों का उत्पादन करता है, वहीं भारत की हिस्सेदारी 1% से भी कम मानी जाती है। यह अंतर केवल निवेश का नहीं, बल्कि स्किल–इंडस्ट्री लिंक, तकनीकी क्षमता और स्केल का है। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि 7 कर्तव्य घोषित किए गए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वे स्किल इंडिया की पुरानी संरचनात्मक विफलताओं को सुधार पाएँगे—या फिर यह भी पुराने कमजोर मॉडल को नई नीति भाषा में दोहराने तक सीमित रह जाएगा।
नदी जल मार्ग योजना: काग़ज़ पर क्रांति, ज़मीन पर सीमित उपयोग
राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम के तहत देश में अब तक 111 राष्ट्रीय जलमार्ग अधिसूचित किए जा चुके हैं, लेकिन आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार इनमें से लगभग 10–15 जलमार्ग ही आंशिक रूप से व्यावसायिक उपयोग में हैं, और कुल माल परिवहन में इनकी हिस्सेदारी 2% से भी कम बनी हुई है। सरकार ने इस सेक्टर में हज़ारों करोड़ रुपये के निवेश का दावा किया है, फिर भी कार्गो ट्रैफिक अपेक्षाकृत सीमित रहा है। बजट 2026 में अब 20 नए जलमार्ग विकसित करने की घोषणा की गई है, जबकि मौजूदा जलमार्गों की ही आर्थिक व्यवहार्यता और नियमित कार्गो फ्लो अभी तक सुनिश्चित नहीं हो पाया है। इसी संदर्भ में गंगा विलास जहाज़ का उदाहरण सामने आता है—जिसे नदी पर्यटन की सफलता के रूप में प्रचारित किया गया, लेकिन यह व्यावसायिक कार्गो परिवहन नहीं बल्कि सीमित लक्ज़री टूरिज़्म मॉडल तक ही सीमित रहा। ऐसे में सवाल यह है कि जब पहले से अधिसूचित दर्जनों जलमार्ग पूर्ण क्षमता पर काम नहीं कर रहे, तब 20 नए जलमार्ग जोड़ना क्या वास्तव में लॉजिस्टिक्स क्रांति लाएगा, या फिर यह भी पुरानी अधूरी योजनाओं का विस्तार मात्र बनकर रह जाएगा।
बजट 2026 में नया क्या है — और अधूरा क्या छोड़ा गया? | PS-PAC विश्लेषण
बजट 2026 में सरकार ने विकास का नैरेटिव मज़बूती से पेश किया है, लेकिन जब इसे सामाजिक क्षेत्रों के वास्तविक आवंटन और संरचनात्मक ज़रूरतों के संदर्भ में देखा जाता है, तो कई अहम खाली जगहें दिखाई देती हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि जैसे बुनियादी क्षेत्रों में वृद्धि अधिकतर नाममात्र या महंगाई-समायोजित (inflation-adjusted) स्तर पर सीमित दिखती है, जबकि नीति-भाषा में इन्हें “प्राथमिकता” बताया गया है। PS-PAC के विश्लेषण में इस बजट की प्रमुख अधूरी कड़ियाँ इस प्रकार उभरती हैं:
- स्वास्थ्य: GDP के अनुपात में सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च अब भी लगभग 1.5% के आसपास, जबकि नीति आयोग स्वयं 2.5% की आवश्यकता मानता है
- शिक्षा: नई घोषणाओं के बावजूद शिक्षा बजट GDP के 6% लक्ष्य से काफी नीचे
- कृषि: MSP, आय स्थिरता और लागत-आधारित सुधारों पर कोई ठोस नया रोडमैप नहीं
- रोज़गार: रोजगार सृजन प्रत्यक्ष लक्ष्य के बजाय स्कीम-आधारित उम्मीदों पर निर्भर
- सामाजिक सुरक्षा: शहरी गरीब, असंगठित श्रमिक और महिलाओं के लिए नई सार्वभौमिक संरचना का अभाव
- कॉरपोरेट बनाम सामाजिक क्षेत्र: कर प्रोत्साहन, उत्पादन-लिंक्ड योजनाएँ और निवेश-अनुकूल घोषणाएँ स्पष्ट हैं, लेकिन सामाजिक क्षेत्र का संतुलन कमजोर दिखाई देता है
PS-PAC के दृष्टिकोण से बजट 2026 की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यह विकास की भाषा तो व्यापक रूप से बोलता है, लेकिन मानव विकास के निर्णायक क्षेत्रों में ठोस, मापनीय और जवाबदेह विस्तार से बचता हुआ नज़र आता है। यही वह अधूरापन है, जो “विकसित भारत” के दावे और ज़मीनी हकीकत के बीच की दूरी को बनाए रखता है।
निष्कर्ष : विकसित भारत 2047: रोडमैप या राजनीतिक भ्रम? — PS-PAC
बजट 2026 ने “विकसित भारत 2047” के सपने को एक बार फिर बड़े आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया है, लेकिन पूरे बजट भाषण और घोषणाओं को समग्र रूप से देखने पर स्पष्ट समय-सीमा, मापनीय लक्ष्य और संस्थागत जवाबदेही का अभाव साफ दिखाई देता है। सी-प्लेन से लेकर स्मार्ट सिटी, स्किल इंडिया से लेकर नदी जलमार्ग और अब मैन्युफैक्चरिंग के “7 कर्तव्य” तक—बार-बार यह पैटर्न सामने आता है कि बिना पिछली योजनाओं की निष्पक्ष समीक्षा किए, नई योजनाओं को नए नाम और नई भाषा में पेश किया जा रहा है। यही कारण है कि घोषणाएँ तो बढ़ती हैं, लेकिन ज़मीनी परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं दिखते।
PS-PAC के विश्लेषण के अनुसार, यदि 2047 वास्तव में एक राष्ट्रीय विकास-लक्ष्य है, न कि केवल एक राजनीतिक नैरेटिव, तो जनता और नीति-निर्माताओं को कुछ बुनियादी सवाल पूछने होंगे:
- पिछली योजनाओं में क्या सफल हुआ और क्या असफल, इसकी सार्वजनिक ऑडिट रिपोर्ट कहाँ है?
- हर नई योजना के लिए स्पष्ट टाइमलाइन, आउटपुट और जिम्मेदार संस्था कौन-सी है?
- सामाजिक क्षेत्र, रोज़गार और मानव विकास को कॉरपोरेट-केंद्रित विकास मॉडल के साथ संतुलित कैसे किया जाएगा?
अंततः, विकसित भारत का सपना केवल बजट भाषणों, विज़न डॉक्युमेंट्स और नए नामों से साकार नहीं होगा, बल्कि ईमानदार मूल्यांकन, नीतिगत निरंतरता और जवाबदेह शासन से ही संभव है। बजट 2026 इसी कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं—यह फैसला जनता को आंकड़ों, अनुभवों और सवाल पूछने की ताक़त के साथ स्वयं करना होगा। यही PS-PAC का उद्देश्य है: सपनों पर नहीं, तथ्यों पर आधारित लोकतांत्रिक विमर्श।


0 Comments