उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जातिगत समीकरण केवल सामाजिक संरचना नहीं, बल्कि चुनावी परिणाम तय करने वाला सबसे निर्णायक फैक्टर है। यहाँ चुनाव सिर्फ विचारधारा या घोषणापत्र से नहीं जीते जाते, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस सीट पर कौन-सी जाति, कितना और किस दिशा में वोट करती है। UP की लगभग हर विधानसभा सीट की अपनी अलग सामाजिक बनावट है। कहीं OBC निर्णायक है, कहीं SC, कहीं सवर्ण या अल्पसंख्यक—और कई सीटों पर यह संतुलन बेहद नाज़ुक होता है। ऐसे में राज्य-स्तरीय औसत आँकड़ों पर आधारित रणनीति अक्सर ग्राउंड रियलिटी से कट जाती है और हार का कारण बनती है।
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| UP Election Caste Equation – PS-PAC |
PS-PAC (Power Shift – Political Advisory Council) का मानना है कि चुनावी रणनीति की असली शुरुआत सीट-वाइज़ जातिगत विश्लेषण से होती है। जब तक यह स्पष्ट न हो कि किसी सीट पर किस सामाजिक समूह का वोट निर्णायक है, तब तक उम्मीदवार चयन, गठबंधन, नैरेटिव और बूथ रणनीति—all अधूरी रहती हैं। यह लेख UP विधानसभा चुनाव में जातिगत समीकरणों को रणनीतिक नजरिये से समझाने का प्रयास है—ना कि केवल आंकड़ों की सूची के रूप में, बल्कि यह बताने के लिए कि इन समीकरणों को वोट बैंक मैपिंग और चुनावी जीत में कैसे बदला जाता है।
उत्तर प्रदेश की जातिगत संरचना
उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना चार प्रमुख वर्गों—OBC, SC, सवर्ण और अल्पसंख्यक—पर आधारित है। Census of India 2011, NSSO के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण और Sachar Committee Report जैसे मानक स्रोतों के आधार पर राज्य-स्तर पर अनुमानतः OBC 40–42%, SC 20–21%, सवर्ण 18–20% और अल्पसंख्यक (मुख्यतः मुस्लिम) 19–20% के आसपास माने जाते हैं। ये आंकड़े समग्र तस्वीर देते हैं, लेकिन विधानसभा स्तर पर इनका प्रभाव अलग-अलग होता है।
PS-PAC के रणनीतिक विश्लेषण के अनुसार, चुनावी निर्णायकता केवल संख्या से नहीं, बल्कि सीट-वाइज़ सामाजिक संतुलन और मतदान व्यवहार से तय होती है। इसे समझने के लिए निम्न बिंदु पर्याप्त हैं:
- सीट-वाइज़ जातिगत संरचना, राज्य-स्तरीय औसत से अधिक निर्णायक होती है
- केंद्रित जाति समूह, बड़ी लेकिन बिखरी आबादी की तुलना में अधिक प्रभावी होते हैं
- OBC और SC वर्गों का उप-जातीय विभाजन, अलग-अलग सीटों पर अलग भूमिका निभाता है
- अल्पसंख्यक वोट कई सीटों पर निर्णायक होता है, लेकिन उम्मीदवार और गठबंधन पर निर्भर करता है
इसी संक्षिप्त ढांचे के आधार पर PS-PAC मॉडल में सीट-वाइज़ जातिगत मैपिंग तैयार की जाती है, जो आगे की पूरी चुनावी रणनीति की नींव बनती है।
विधानसभा सीट-वाइज़ जातिगत समीकरण क्यों ज़रूरी
उत्तर प्रदेश में चुनाव राज्य-स्तर के आंकड़ों से नहीं, बल्कि सीट-वाइज़ जातिगत संतुलन से जीते जाते हैं। हर विधानसभा सीट की सामाजिक बनावट अलग होती है, इसलिए एक जैसी रणनीति सभी सीटों पर काम नहीं करती।
PS-PAC के रणनीतिक आकलन के अनुसार इसके मुख्य कारण हैं:
- सीट बनाम राज्य का फर्क: किसी जाति का राज्य-स्तरीय प्रतिशत और सीट-स्तरीय प्रभाव अक्सर अलग होता है।
- निर्णायक वोट की पहचान: कई सीटों पर 5–7% वोट ही जीत तय करता है।
- स्थानीय मतदान व्यवहार: एक ही जाति अलग क्षेत्रों में अलग दलों को वोट करती है।
- गलत औसत का जोखिम: राज्य-स्तरीय सोच सीट-स्तरीय हार का कारण बनती है।
वोट बैंक मैपिंग की PS-PAC पद्धति
- जातिगत संरचना – कौन-सा सामाजिक समूह संख्यात्मक रूप से मौजूद है
- क्षेत्रीय एकाग्रता – वह समूह किस इलाके/बूथ में केंद्रित है
- मतदान व्यवहार – वह समूह परंपरागत है या हर चुनाव में स्विंग करता है
जातिगत समीकरण, उम्मीदवार चयन, गठबंधन और चुनावी नैरेटिव
- उम्मीदवार चयन और Winnability: उम्मीदवार की जाति तभी असर डालती है जब वह सीट के निर्णायक सामाजिक समूह में स्वीकार्य हो।
- प्रतीकात्मक बनाम व्यावहारिक चयन: केवल जाति-आधारित प्रतीकात्मक उम्मीदवार कई बार नुकसानदेह साबित होते हैं।
- गठबंधन और वोट ट्रांसफर: गठबंधन तभी सफल होता है जब सहयोगी दलों के वोट ज़मीनी स्तर पर ट्रांसफर हों।
- एडजस्टमेंट की चूक: गलत सीट शेयरिंग या संतुलन बिगड़ने से कोर वोटर भ्रमित हो सकता है।
- नैरेटिव का चयन: कुछ सीटों पर जातिगत अपील, तो कुछ क्षेत्रों में विकास और स्थानीय मुद्दे अधिक प्रभावी होते हैं।
निष्कर्ष: PS-PAC मॉडल क्यों है निर्णायक और अलग
- सीट-वाइज़ रणनीतिक सोच: हर विधानसभा सीट को अलग चुनावी इकाई मानकर सामाजिक संरचना, वोटिंग पैटर्न और स्थानीय समीकरणों का विश्लेषण किया जाता है।
- डेटा और ग्राउंड रियलिटी का संयोजन: जातिगत आंकड़ों को वास्तविक मतदान व्यवहार, वोट ट्रांसफर क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव के साथ जोड़ा जाता है।
- Winnability-केंद्रित निर्णय: उम्मीदवार चयन, गठबंधन एडजस्टमेंट और चुनावी नैरेटिव—हर निर्णय का उद्देश्य केवल जीत सुनिश्चित करना होता है।
- लचीला और अनुकूल मॉडल: बदलते राजनीतिक माहौल, गठबंधन समीकरण और मतदाता व्यवहार के अनुसार रणनीति को समय पर अपडेट किया जाता है।
- व्यवहारिक चुनावी दृष्टिकोण: यह मॉडल केवल विश्लेषण नहीं करता, बल्कि सत्ता तक पहुँचने की स्पष्ट रणनीतिक दिशा देता है।

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