कल तक चाबहार पोर्ट को भारत की ऐतिहासिक कूटनीतिक जीत बताया गया। संसद से लेकर टीवी डिबेट तक इसे पाकिस्तान को बाइपास करने, अफगानिस्तान को समुद्री रास्ता देने और चीन के ग्वादर पोर्ट व CPEC के रणनीतिक विस्तार को चुनौती देने का प्रतीक बनाकर पेश किया गया। भारत ने 2016 में ईरान के साथ त्रिपक्षीय समझौता किया, 2018 से अपनी सरकारी कंपनी India Ports Global Limited (IPGL) के माध्यम से शहीद बेहेश्ती टर्मिनल का संचालन शुरू किया और करीब 120 मिलियन डॉलर का निवेश किया। इसी पोर्ट के ज़रिए भारत ने अफगानिस्तान को गेहूं और मानवीय सहायता भेजी, और इसे International North-South Transport Corridor (INSTC) की रीढ़ बताया गया—यहाँ तक कि अमेरिका ने भी मानवीय आधार पर चाबहार को प्रतिबंधों से आंशिक छूट दी।
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| Strategic Failure in Chabahar | PS-PAC |
लेकिन आज सच्चाई यह है कि भारत की ऑपरेशनल भूमिका सीमित होती दिख रही है, भविष्य की प्रतिबद्धताओं पर कोई स्पष्ट रोडमैप सामने नहीं है और पूरा प्रोजेक्ट अमेरिकी प्रतिबंधों से जुड़ी अस्थायी छूट (waiver) पर टिका हुआ नजर आता है। इसके बावजूद सरकार यह बताने से बच रही है कि चाबहार में भारत की वास्तविक स्थिति क्या रह गई है। यह चुप्पी सामान्य नहीं है—यह उस रणनीतिक विफलता को छुपाने की कोशिश है, जिसे कभी राष्ट्रहित की बड़ी उपलब्धि बताकर बेचा गया था। सवाल अब सिर्फ कूटनीति का नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही का है: अगर सब कुछ ठीक है, तो सरकार तथ्यों के साथ सच क्यों नहीं रखती, और अगर नहीं है, तो देश को अंधेरे में क्यों रखा जा रहा है?
चाबहार पोर्ट और भारत: सरकारी दावे बनाम ज़मीनी हकीकत
सरकार लगातार यह दोहराती रही है कि भारत चाबहार पोर्ट परियोजना से पीछे नहीं हटा है, लेकिन ज़मीनी संकेत इस दावे को कमजोर करते हैं। हकीकत यह है कि आज पूरा प्रोजेक्ट अमेरिकी sanctions waiver पर टिका हुआ है, जिसकी वैधता केवल 26 अप्रैल 2026 तक सीमित है। इसी दबाव में भारत लगभग 120 मिलियन डॉलर का भुगतान पूरा कर चुका है, जिससे भविष्य की कोई ठोस कॉन्ट्रैक्चुअल प्रतिबद्धता फिलहाल शेष नहीं दिखती। इससे भी अधिक गंभीर संकेत यह है कि भारत की सरकारी कंपनी India Ports Global Limited (IPGL) के बोर्ड से सरकारी निदेशकों का इस्तीफा हो चुका है और अमेरिकी प्रतिबंध जोखिम से बचने के नाम पर कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट तक बंद कर दी गई। अगर भारत की भूमिका आज भी उतनी ही मज़बूत है, जितना सरकार दावा करती है, तो फिर यह संस्थागत समेटन, यह सार्वजनिक अदृश्यता और यह रणनीतिक अस्पष्टता क्यों? विपक्ष इसी आधार पर आरोप लगा रहा है कि भारत प्रभावतः चाबहार पर अपनी पकड़ ढीली कर चुका है और अमेरिकी दबाव के सामने झुक गया है। सरकार इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है, लेकिन देश को अब भी इन बुनियादी सवालों के जवाब नहीं दिए गए—
- अगर भारत चाबहार से पीछे नहीं हटा है, तो पूरी परियोजना अमेरिकी छूट की समय-सीमा पर क्यों निर्भर है?
- जब 120 मिलियन डॉलर का भुगतान पूरा हो चुका है, तो भारत की दीर्घकालिक रणनीति और औपचारिक रोडमैप कहां है?
- IPGL के सरकारी निदेशकों का इस्तीफा और संस्थागत ढांचा कमजोर होना किस दिशा की ओर इशारा करता है?
- अगर सब कुछ सामान्य है, तो IPGL की आधिकारिक वेबसाइट और सार्वजनिक जानकारी क्यों हटाई गई?
- क्या यह सब अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से की जा रही एक “लो-प्रोफाइल रणनीतिक वापसी” नहीं है?
- संसद और देश को अब तक यह स्पष्ट क्यों नहीं बताया गया कि चाबहार में भारत की वास्तविक स्थिति क्या है?
भारत की विदेश नीति अमेरिका के सामने नतमस्तक क्यों?
चाबहार पोर्ट का मामला भारत–अमेरिका रणनीतिक संबंधों की उस असहज सच्चाई को उजागर करता है, जहाँ “रणनीतिक साझेदारी” का दावा अक्सर अमेरिकी दबाव के आगे बेबस दिखता है। एक तरफ भारत खुद को स्वतंत्र विदेश नीति और Strategic Autonomy का पैरोकार बताता है, वहीं दूसरी ओर ईरान जैसे संप्रभु देश के साथ उसके आर्थिक और कूटनीतिक निर्णय सीधे अमेरिकी प्रतिबंध नीति से नियंत्रित होते नजर आते हैं। अमेरिका ने 2018 में ईरान पर दोबारा कड़े प्रतिबंध लगाए, और उसी के बाद भारत को चाबहार जैसी अहम परियोजना पर भी waiver मांगकर काम करना पड़ा—यानी भारत की भूमिका किसी समझौते के अधिकार से नहीं, बल्कि अमेरिकी अनुमति से चलती रही।
नीचे दी गई PS-PAC की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट इसी विरोधाभास को तथ्यों, निवेश, प्रतिबंधों और रणनीतिक सीमाओं के साथ दृश्य रूप में सामने रखती है—जहाँ सरकारी दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई साफ़ दिखाई देती है।
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| Chabahar: India strategic failure report | PS PAC |
यह वही अमेरिका है जिसके साथ भारत ने QUAD, COMCASA, BECA और LEMOA जैसे सैन्य समझौते किए, अरबों डॉलर के हथियार सौदे किए और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में खुद को प्रमुख साझेदार के रूप में स्थापित किया। इसके बावजूद, जब बात भारत के अपने क्षेत्रीय हितों—पाकिस्तान को बाइपास करने, अफगानिस्तान तक पहुँच और चीन के ग्वादर पोर्ट को संतुलित करने—की आई, तो भारत को अमेरिकी प्रतिबंध नीति के आगे झुकना पड़ा। सवाल यह नहीं है कि अमेरिका भारत का रणनीतिक साझेदार है या नहीं; सवाल यह है कि अगर साझेदारी बराबरी की है, तो फिर भारत को चाबहार जैसे राष्ट्रीय हित के प्रोजेक्ट पर भी बार-बार सफाई क्यों देनी पड़ रही है? क्या यह विदेश नीति संतुलन है, या फिर एक ऐसी निर्भरता, जहाँ निर्णय दिल्ली में नहीं, बल्कि वॉशिंगटन की लाल रेखाओं को देखकर लिए जा रहे हैं?
चीन–ग्वादर बनाम भारत–चाबहार: राष्ट्रहित या सिर्फ चुनावी प्रचार?
चाबहार और ग्वादर की तुलना दरअसल दो अलग-अलग रणनीतिक दृष्टिकोणों की कहानी है। चीन ने पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट को केवल एक बंदरगाह नहीं, बल्कि CPEC (China–Pakistan Economic Corridor) की रीढ़ के रूप में विकसित किया—जहाँ अरबों डॉलर का निवेश, सैन्य-नौसैनिक पहुँच और दीर्घकालिक राजनीतिक प्रतिबद्धता साफ़ दिखती है। इसके उलट भारत ने चाबहार को वर्षों तक भाषणों, संसद में दावों और टीवी डिबेट्स में “रणनीतिक जवाब” के तौर पर पेश किया, लेकिन ज़मीनी स्तर पर न तो निवेश की निरंतरता दिखी, न ही राजनीतिक इच्छाशक्ति की स्पष्टता। चाबहार को कभी पाकिस्तान को बाइपास करने का हथियार बताया गया, कभी अफगानिस्तान के लिए जीवनरेखा, और कभी चीन के प्रभाव को रोकने की ढाल—लेकिन हर चुनावी मौसम के बाद यह प्रोजेक्ट फिर अमेरिकी प्रतिबंधों, कूटनीतिक असमंजस और सरकारी चुप्पी में फँसता चला गया। सवाल यह है कि अगर चाबहार सच में राष्ट्रहित की प्राथमिकता था, तो उसे अमेरिकी दबाव के बावजूद संस्थागत संरक्षण क्यों नहीं मिला? और अगर नहीं था, तो फिर इसे चुनावी प्रचार में “ऐतिहासिक उपलब्धि” बनाकर क्यों बेचा गया? ग्वादर आज चीन की दीर्घकालिक रणनीति का ठोस प्रतीक है, जबकि चाबहार भारत की उस विदेश नीति का आईना बनता जा रहा है, जहाँ बड़े-बड़े दावे तो किए जाते हैं, लेकिन उन्हें निभाने की राजनीतिक कीमत चुकाने से बचा जाता है।
निष्कर्ष: चाबहार में सरकार की रणनीतिक विफलता की कीमत चुका रहा है देश | PS-PAC
चाबहार पोर्ट आज इस बात का प्रतीक बन चुका है कि कैसे बड़े-बड़े राष्ट्रवादी दावे, ठोस रणनीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में खोखले साबित हो जाते हैं। जिस परियोजना को भारत की विदेश नीति की ऐतिहासिक उपलब्धि बताया गया, वही आज अमेरिकी प्रतिबंधों की शर्तों, संस्थागत पीछे हटने और सरकारी चुप्पी के बीच फँसी हुई है। यह सिर्फ कूटनीतिक असहजता नहीं, बल्कि एक गंभीर रणनीतिक विफलता है—जिसकी कीमत भारत अपने क्षेत्रीय प्रभाव, अफगानिस्तान तक पहुँच, और चीन–पाकिस्तान धुरी के सामने कमजोर पड़ती स्थिति के रूप में चुका रहा है। Power Shift – Political Advisory Council (PS-PAC) के आकलन में चाबहार का संकट यह साफ़ दिखाता है कि मौजूदा सरकार ने विदेश नीति को दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की बजाय प्रचार और तात्कालिक संतुलन के हवाले छोड़ दिया। जब सरकार न स्पष्ट रोडमैप देती है, न संसद को जवाबदेह बनाती है, और न ही असफलताओं को स्वीकार करने का साहस दिखाती है, तब यह कमजोरी केवल राजनीतिक नहीं रहती—यह राष्ट्रीय नुकसान में बदल जाती है। देश को अब नारों की नहीं, जवाबों की ज़रूरत है; क्योंकि रणनीतिक चूकें जब छुपाई जाती हैं, तो उनका बोझ अंततः पूरे राष्ट्र को उठाना पड़ता है।


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