उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का इतिहास केवल सत्ता के उत्थान का नहीं, बल्कि उसके क्रमिक क्षरण, अस्थायी पुनरुत्थान और अंततः गहरे पतन की राजनीतिक गाथा है, जो भारतीय लोकतंत्र में आए सामाजिक और वैचारिक बदलावों को भी उजागर करता है। 1952 से 1967 तक गोविंद बल्लभ पंत, सम्पूर्णानंद, चन्द्रभानु गुप्त और सुचेता कृपलानी जैसे दिग्गज नेताओं के नेतृत्व में कांग्रेस ने राज्य पर लगभग निर्विवाद शासन किया; इस दौर में पार्टी का संगठन गाँव-गाँव तक फैला था और सत्ता, प्रशासन व समाज के बीच एक स्वाभाविक संतुलन मौजूद था। लेकिन 1967 के चुनाव ने इस वर्चस्व को निर्णायक झटका दिया—भूमि सुधारों की अधूरी राजनीति, पिछड़े और दलित वर्गों की बढ़ती राजनीतिक चेतना, तथा चरण सिंह के नेतृत्व में उभरे संयुक्त विधायक दल जैसे गैर-कांग्रेस गठबंधनों ने कांग्रेस के पारंपरिक सामाजिक गठजोड़ को तोड़ दिया। इसके बाद कांग्रेस उत्तर प्रदेश में लगातार अस्थिरता की शिकार होती गई; बार-बार सरकारें गिरना, अल्पमत और समर्थन-आधारित शासन, तथा संगठन का व्यक्तित्व-केंद्रित होना उसकी जमीनी ताकत को कमजोर करता चला गया। 1970 और 1980 के दशकों में कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा और विशेष रूप से नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस ने प्रशासनिक अनुभव, केंद्रीय समर्थन और सहानुभूति लहर के बल पर सत्ता में वापसी तो की, जिसे वी.पी. सिंह, श्रीपति मिश्र और वीर बहादुर सिंह ने आगे बढ़ाया, लेकिन यह मजबूती टिकाऊ सामाजिक पुनर्संरचना पर नहीं, बल्कि सत्ता-केन्द्रित राजनीति पर आधारित थी। 1989 के बाद मंडल राजनीति ने पिछड़े वर्गों को स्वतंत्र राजनीतिक धुरी दी, जबकि कमंडल राजनीति ने धार्मिक-सांस्कृतिक ध्रुवीकरण के माध्यम से भाजपा को वैचारिक बढ़त दिलाई—और इन दोनों के बीच कांग्रेस न तो सामाजिक न्याय की निर्णायक अगुवा बन सकी, न ही हिंदुत्व के राजनीतिक नैरेटिव का प्रभावी प्रतिकार कर पाई। परिणामस्वरूप संगठनात्मक क्षरण, क्षेत्रीय दलों के उभार, नेतृत्व का केंद्रीकरण और जमीनी कार्यकर्ताओं के विघटन ने कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में हाशिये पर पहुँचा दिया, जहाँ कभी राज्य की राजनीति की धुरी रही पार्टी आज अपने अस्तित्व और प्रासंगिकता की लड़ाई लड़ रही है।
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| उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पुनरुत्थान की संभावना |
1989 के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का निरंतर पतन : कारण और राजनीतिक वास्तविकताएँ
1989 के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का राजनीतिक पतन केवल चुनावी हारों की श्रृंखला नहीं रहा, बल्कि यह संगठनात्मक विघटन, सामाजिक आधार के क्षरण और वैचारिक अस्पष्टता की संयुक्त प्रक्रिया का परिणाम बन गया। मंडल राजनीति के उभार ने जहाँ पिछड़े वर्गों को समाजवादी दलों की ओर स्थायी रूप से स्थानांतरित कर दिया, वहीं कमंडल राजनीति ने धार्मिक-सांस्कृतिक ध्रुवीकरण के माध्यम से भाजपा को उत्तर प्रदेश में एक सशक्त वैचारिक विकल्प के रूप में स्थापित कर दिया; इन दोनों ध्रुवों के बीच कांग्रेस का पारंपरिक ‘समन्वयवादी’ मॉडल अप्रासंगिक होता चला गया। 1990 के दशक में कांग्रेस न तो ओबीसी–दलित राजनीति की स्पष्ट नेता बन सकी और न ही हिंदुत्व की राजनीति का वैचारिक प्रतिरोध खड़ा कर पाई, परिणामस्वरूप उसका सामाजिक आधार लगातार सिमटता गया। इसके साथ ही प्रदेश संगठन का केंद्रीय नेतृत्व पर अत्यधिक निर्भर होना, स्थानीय नेतृत्व का अभाव, बूथ-स्तर की संरचना का कमजोर होना और चुनावी रणनीति में निरंतर अस्थिरता ने कांग्रेस को जमीनी राजनीति से लगभग काट दिया। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने जातीय गणित और सामाजिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से जो स्थायी वोट बैंक तैयार किया, उसके मुकाबले कांग्रेस केवल गठबंधन-आधारित राजनीति तक सीमित रह गई, जिससे उसकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और अधिक धुंधली होती गई। 2014 के बाद भाजपा के आक्रामक विस्तार, मजबूत संगठन, राष्ट्रवादी नैरेटिव और कल्याणकारी योजनाओं ने कांग्रेस के बचे-खुचे आधार को भी प्रभावित किया। आज उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति इसी दीर्घकालिक राजनीतिक विफलता की परिणति है, जहाँ सत्ता से दूरी केवल चुनावी कमजोरी नहीं, बल्कि संगठन, नेतृत्व और सामाजिक संवाद—तीनों स्तरों पर गहरे संकट का संकेत देती है।
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PS-PAC का विश्लेषण : क्या कांग्रेस उत्तर प्रदेश में राजनीतिक वापसी कर सकती है?
PS-PAC (Power Shift – Political Advisory Council) ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की 1989 के बाद की लगातार गिरावट का दीर्घकालिक और बहु-स्तरीय अध्ययन किया है, जिसमें चुनावी आँकड़ों, सामाजिक संरचना, संगठनात्मक व्यवहार और क्षेत्रीय राजनीतिक प्रवृत्तियों का गहन विश्लेषण शामिल है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस का पतन किसी एक चुनाव या एक नेतृत्व की विफलता नहीं, बल्कि दशकों तक चली रणनीतिक चूकों, कमजोर संगठनात्मक निवेश और बदलते सामाजिक यथार्थ को समय पर न समझ पाने का परिणाम रहा है। हालांकि, PS-PAC के आकलन के अनुसार कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में पूर्ण रूप से अप्रासंगिक हो जाना अनिवार्य नहीं है। पार्टी के पास आज भी ऐतिहासिक विरासत, अल्पसंख्यक मतदाताओं में सीमित भरोसा, शहरी मध्यम वर्ग के कुछ हिस्सों में स्वीकार्यता और राष्ट्रीय स्तर पर वैचारिक स्पेस मौजूद है, जिसे सही रणनीति के माध्यम से पुनः संगठित किया जा सकता है। PS-PAC मानता है कि यदि कांग्रेस जाति-आधारित गणित से आगे बढ़कर सामाजिक न्याय, आर्थिक असुरक्षा, स्थानीय नेतृत्व और बूथ-स्तरीय संगठन निर्माण पर केंद्रित दीर्घकालिक रणनीति अपनाती है, तो वह उत्तर प्रदेश में धीरे-धीरे एक प्रासंगिक राजनीतिक विकल्प के रूप में पुनः उभर सकती है। यह वापसी तात्कालिक सत्ता की नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता, संगठनात्मक पुनर्निर्माण और वैचारिक स्पष्टता की वापसी होगी—और यही वह आधार है जिस पर भविष्य की सत्ता राजनीति संभव हो सकती है ।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की चुनौती : समस्या की सही पहचान
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की वर्तमान स्थिति को अक्सर केवल चुनावी हार, कमजोर नेतृत्व या असफल गठबंधनों तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि वास्तविक चुनौती इससे कहीं अधिक गहरी, दीर्घकालिक और संरचनात्मक है। PS-PAC (Power Shift – Political Advisory Council) के अध्ययन के अनुसार समस्या केवल चेहरे या नेतृत्व परिवर्तन की नहीं, बल्कि उस निरंतर राजनीतिक संवाद के टूटने की है, जो दशकों तक समाज के विभिन्न वर्गों—किसानों, पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों और शहरी मध्यम वर्ग—के साथ कांग्रेस की पहचान बना हुआ था। कांग्रेस की कठिनाई यह नहीं रही कि उसके पास मुद्दों की कमी है, बल्कि यह रही कि वे मुद्दे संगठित राजनीतिक व्यवहार, स्थानीय नेतृत्व और जमीनी उपस्थिति में रूपांतरित नहीं हो पाए।
उत्तर प्रदेश जैसे सामाजिक रूप से विविध और राजनीतिक रूप से अत्यंत प्रतिस्पर्धी राज्य में राजनीति केवल घोषणाओं, चुनावी नारों या केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे नहीं चलती, बल्कि निरंतर सामाजिक संपर्क, क्षेत्र-विशेष की संवेदनशील समझ और बूथ-स्तरीय संगठन निर्माण से आगे बढ़ती है। PS-PAC के विश्लेषण में यह भी सामने आया है कि जब कोई दल चुनावों के बीच के समय में निष्क्रिय हो जाता है, तब वह धीरे-धीरे सामाजिक स्मृति से बाहर होने लगता है—और यही चुनौती कांग्रेस के सामने लंबे समय से खड़ी रही है। इस दृष्टि से कांग्रेस की समस्या को केवल तात्कालिक सत्ता-वापसी के लक्ष्य से नहीं, बल्कि एक व्यापक और दीर्घकालिक राजनीतिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखना अधिक यथार्थपरक और व्यवहारिक होगा।
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निष्कर्ष : कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश केवल चुनौती नहीं, राजनीतिक परीक्षा है
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति को यदि केवल बीते चुनावों के परिणामों के आधार पर आँका जाए, तो यह एक निराशाजनक तस्वीर प्रस्तुत करती है; किंतु यदि इसे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक संरचना और दीर्घकालिक राजनीतिक प्रवृत्तियों के साथ समझा जाए, तो यह राज्य कांग्रेस के लिए केवल एक संकट नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक समझ, संगठनात्मक क्षमता और वैचारिक स्पष्टता की सबसे बड़ी परीक्षा भी बन जाता है। उत्तर प्रदेश वह प्रयोगशाला है जहाँ भारतीय लोकतंत्र की लगभग हर प्रमुख राजनीतिक धारा—सामाजिक न्याय, पहचान की राजनीति, धार्मिक ध्रुवीकरण और कल्याणकारी राज्य—ने अपने सबसे तीखे रूप ग्रहण किए हैं, और इन्हीं परिस्थितियों में कांग्रेस की कमजोरियाँ भी उजागर हुई हैं। PS-PAC का मानना है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का भविष्य किसी तात्कालिक गठबंधन, चेहरे या चुनावी प्रयोग से तय नहीं होगा, बल्कि इस बात से तय होगा कि पार्टी इस राज्य को कितनी गंभीरता से समझती है और कितना समय, संगठनात्मक धैर्य तथा राजनीतिक विनम्रता इसमें निवेश करने को तैयार है। यदि कांग्रेस उत्तर प्रदेश को केवल एक चुनावी राज्य नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक पुनर्निर्माण की भूमि के रूप में देखती है, तो उसका पुनरुत्थान असंभव नहीं है—पर यह पुनरुत्थान अचानक नहीं, बल्कि सतत, अनुशासित और सामाजिक यथार्थ से जुड़े प्रयासों के माध्यम से ही संभव होगा। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की वापसी का प्रश्न दरअसल सत्ता का नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता के पुनर्निर्माण का प्रश्न है—और इसी उत्तर पर पार्टी का भविष्य निर्भर करेगा।

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Nice 👍
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