प्रियंका गांधी बनेंगी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की कार्यकारी अध्यक्ष ?

आजादी के बाद कांग्रेस के इतिहास में यह एक उल्लेखनीय तथ्य रहा है कि जब-जब राष्ट्रीय राजनीति में पार्टी कमजोर, बिखरी या हाशिए पर जाती दिखी, तब-तब उसका नेतृत्व किसी न किसी रूप में एक महिला के हाथों में आया। 1966 में लाल बहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद कांग्रेस गहरे नेतृत्व संकट और आंतरिक गुटबाज़ी से जूझ रही थी। ऐसे समय में इंदिरा गांधी ने पार्टी की बागडोर संभाली। 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बावजूद उन्होंने न केवल संगठन पर निर्णायक पकड़ बनाई, बल्कि 1969 से 1977 के बीच सामाजिक-आर्थिक सुधारों, मजबूत राजनीतिक नेतृत्व और जनसमर्थन के बल पर कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति की शीर्ष शक्ति के रूप में स्थापित किया। इसी तरह 1990 के दशक के बाद जब गठबंधन राजनीति के दौर में कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही थी, तब 1998 में सोनिया गांधी ने पार्टी का नेतृत्व संभाला। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने महज छह वर्षों में 2004 में केंद्र में सरकार बनाई और 2004 से 2014 तक एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में बनी रही। वर्तमान परिदृश्य में एक बार फिर कांग्रेस गंभीर राजनीतिक चुनौतियों और सीमित प्रभाव की स्थिति में खड़ी है। ऐसे में यह प्रश्न राजनीतिक हलकों में तेजी से उठ रहा है कि क्या प्रियंका गांधी  को कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका सौंपकर कांग्रेस एक बार फिर उसी ऐतिहासिक राह पर लौटने का प्रयास करेगी, जिस पर कभी इंदिरा गांधी ने पार्टी को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया था।
PS-PAC:प्रियंका गांधी बनेंगी INC की कार्यकारी अध्यक्ष ?
प्रियंका गांधी कांग्रेस कार्यकारी अध्यक्ष विश्लेषण

प्रियंका गांधी : कांग्रेस की उभरती रणनीतिक धुरी

कांग्रेस में प्रियंका गांधी वाड्रा की भूमिका को केवल एक सक्रिय प्रचारक या भावनात्मक वक्ता के रूप में देखना उनके राजनीतिक कद को अधूरा समझना होगा। सोनिया गांधी के 1998 में पार्टी अध्यक्ष बनने के दौर से ही संगठनात्मक रणनीति, राजनीतिक संप्रेषण और नेतृत्व की सार्वजनिक छवि को आकार देने में प्रियंका गांधी की भूमिका एक सुलझी हुई रणनीतिकार की रही है। पार्टी के भीतर लंबे समय से यह धारणा रही है कि सत्ता की आक्रामक भाषा के बजाय नैतिक अपील, संवैधानिक मर्यादा और जनता से सीधा संवाद—इन तत्वों को मजबूत करने में प्रियंका की सलाह निर्णायक रही।

प्रियंका गांधी की रणनीतिक समझ का केंद्र कांग्रेस को केवल चुनावी मंच नहीं, बल्कि वैचारिक संघर्ष के वाहक के रूप में प्रस्तुत करना रहा है। उनके हस्तक्षेप प्रतीकों, भाषा और समयबद्ध राजनीतिक निर्णयों पर केंद्रित रहे हैं, जिससे पार्टी की राजनीतिक पहचान को स्पष्टता मिलती है। यदि प्रियंका गांधी को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, तो कांग्रेस को केवल एक नया चेहरा नहीं बल्कि एक स्पष्ट रणनीतिक दिशा मिल सकती है—जो संगठन को रक्षात्मक राजनीति से बाहर निकालकर अनुशासित, आक्रामक और जमीनी संघर्ष की ओर ले जाने की क्षमता रखती है। यही वह गुण है जो मौजूदा दौर में कांग्रेस के पुनरुत्थान की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है।

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बारह राज्य, एक दिशा: प्रियंका गांधी की अग्निपरीक्षा

2026 और 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए केवल राज्यों की सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका दोबारा तय करने का निर्णायक अवसर हैं। 2026 में पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी तथा 2027 में पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, मणिपुर, गुजरात और गोवा—ये बारह राज्य मिलकर देश की राजनीतिक दिशा को प्रभावित करने वाले केंद्र बनते हैं। इनमें विशेषकर उत्तर प्रदेश, अपनी विशाल आबादी और राजनीतिक प्रभाव के कारण, हमेशा यह तय करता रहा है कि दिल्ली की सत्ता का संतुलन किस ओर झुकेगा।
ऐसे निर्णायक दौर में यदि प्रियंका गांधी कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालती हैं, तो कांग्रेस को इसका सबसे बड़ा लाभ चुनावी रणनीति के केंद्रीकरण, संदेश की स्पष्टता और उत्तर भारत में संगठनात्मक धार की वापसी के रूप में मिल सकता है। प्रियंका गांधी का जमीनी राजनीतिक अनुभव और उत्तर प्रदेश पर उनका विशेष फोकस कांग्रेस को इन बहु-राज्यीय चुनावों में एक साझा राष्ट्रीय नैरेटिव के साथ उतरने की क्षमता देता है। खासकर 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, प्रियंका गांधी के नेतृत्व में, कांग्रेस के लिए केवल एक राज्य का चुनाव नहीं बल्कि केंद्र की राजनीति में पुनः निर्णायक भूमिका हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन सकता है।

उत्तर प्रदेश: प्रियंका गांधी और जमीनी रणनीति की अनिवार्यता

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी की भूमिका केवल एक स्टार प्रचारक की नहीं, बल्कि उस नेतृत्व की है जो राज्य की राजनीति को भीतर से समझने की क्षमता रखता है। यह राज्य भावनाओं, जातीय संतुलन, स्थानीय सत्ता-संरचनाओं और लंबे राजनीतिक स्मृति-काल से संचालित होता है, जिसे दूर बैठकर बनाए गए किसी भी कॉरपोरेट चुनावी मॉडल में समेटना संभव नहीं है। यदि प्रियंका गांधी कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उत्तर प्रदेश की चुनावी दिशा तय करती हैं, तो कांग्रेस को पहली बार यह अवसर मिल सकता है कि उसकी रणनीति सिर्फ आंकड़ों से नहीं, बल्कि धरातल से पैदा हो।
यही वह बिंदु है जहां अतीत के अनुभव एक स्पष्ट सबक देते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की जमीनी राजनीति को पर्याप्त रूप से न समझ पाने के कारण और कॉर्पोरेट चुनावी रणनीति से कांग्रेस वास्तविक सामाजिक समीकरणों से कटती चली गई। समस्या किसी चुनावी पेशे की नहीं थी, बल्कि इस धारणा की थी कि क्या उत्तर प्रदेश को बाहर से डिजाइन की गई रणनीतिकार की रणनीति से साधा जा सकता है। इस राज्य में चुनाव जीतने के लिए गांव, बूथ, जाति, प्रभावशाली स्थानीय चेहरे और सत्ता-विरोधी मनोविज्ञान को एक साथ पढ़ना पड़ता है—जो केवल सतत राजनीतिक जुड़ाव से ही संभव है। प्रियंका गांधी का उत्तर प्रदेश पर लगातार फोकस और उनका जमीनी हस्तक्षेप कांग्रेस को उसी दिशा में ले जा सकता है जहां रणनीति सलाह के रूप में नहीं, बल्कि संगठन की सामूहिक राजनीतिक समझ के रूप में विकसित होती है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए अब आवश्यकता किसी आयातित चुनावी फार्मूले की नहीं, बल्कि एक ऐसी जमीनी रणनीतिकार  की रणनीतिक सोच की है जो राज्य को पहले समझे, फिर जीते—और यहीं से कांग्रेस के पुनर्निर्माण की वास्तविक शुरुआत हो सकती है।


निष्कर्ष: नेतृत्व, संघर्ष और कांग्रेस की अगली राह

कांग्रेस के इतिहास, वर्तमान चुनौतियों और आगामी चुनावी परिदृश्य पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट होता है कि पार्टी आज एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी है जहाँ उसे केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि राजनीतिक दिशा और नेतृत्व के स्वर को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता है। इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी के दौर यह प्रमाणित करते हैं कि संकट के समय निर्णायक, संवेदनशील और संघर्षशील नेतृत्व ही कांग्रेस को पुनर्जीवित कर सका है। ऐसे संदर्भ में प्रियंका गांधी का संभावित कार्यकारी अध्यक्ष बनना मात्र एक पदगत परिवर्तन नहीं, बल्कि कांग्रेस को जमीनी राजनीति, वैचारिक स्पष्टता और दीर्घकालिक रणनीति से जोड़ने का अवसर हो सकता है। विशेषकर उत्तर प्रदेश जैसे निर्णायक राज्य में यदि नेतृत्व आंकड़ों और नारों से आगे बढ़कर सामाजिक यथार्थ और राजनीतिक साहस के साथ खड़ा होता है, तो कांग्रेस के पुनर्निर्माण की ठोस जमीन तैयार हो सकती है। प्रियंका गांधी का नारा—“लड़की हूं, लड़ सकती हूं”—केवल एक चुनावी पंक्ति नहीं, बल्कि आज कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक प्रतीक बन सकता है: संघर्ष से न डरने का, मैदान में डटे रहने का और कठिन परिस्थितियों में भी लड़कर रास्ता बनाने का संकल्प। यदि कांग्रेस इस भाव को नेतृत्व, संगठन और रणनीति में रूपांतरित कर पाती है, तो कांग्रेस एक बार उस स्वर्णिम काल में पहुंच सकती है जहां इंदिरा गांधी ने पहुंचाया था।

 

 

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11 Comments

  1. India urgently needs a change of ruling party in the centre

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  2. प्रियंका एक युवा नेता हैं। यदि उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाता है, तो इससे कांग्रेस को लाभ होगा।

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  3. Congress jindabaad

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  4. Nice 👍👍👍👍👍👍

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